क्या है UN का ‘Enemy State Clause’ और जापान इसे हटाने की मांग क्यों कर रहा है? तमतमाया चीन, EXPLAINER
जापान UN के ‘Enemy State Clause’ को हटाने की मांग क्यों कर रहा है? चीन इस पर क्यों नाराज है? जानिए इस पुराने प्रावधान का इतिहास और दोनों देशों के बीच विवाद की वजह.
बीते दिनों यूएनजीए सत्र के दौरान ‘Enemy State Clause’ का मुद्दा जापाना ने उठाया था. उसके बाद से जापान और चीन के बीच एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र चार्टर की ‘Enemy State Clause’ को लेकर तनाव चरम पर पहुंच गया है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाए गए इन प्रावधानों में जापान और जर्मनी जैसे तत्कालीन दुश्मन देशों का जिक्र है. जापान अब इन प्रावधानों को पूरी तरह हटाने की मांग कर रहा है. जबकि चीन का कहना है कि जापान की बढ़ती सैन्य ताकत और ताइवान को लेकर उसकी नीति को देखते हुए इस मुद्दे को केवल पुराने प्रावधानों के तौर पर नहीं देखा जा सकता.
क्या है संयुक्त राष्ट्र की ‘Enemy State Clause’?
‘Enemy State Clause’ संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उन प्रावधानों को कहा जाता है, जिनमें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मित्र देशों के खिलाफ लड़ने वाले देशों को ‘enemy states’ के तौर पर संदर्भित किया गया था. इसका संबंध मुख्य रूप से चार्टर के आर्टिकल 53, 77 और 107 से है. उस समय इन प्रावधानों का मकसद युद्ध के बाद की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में जर्मनी, जापान और उनके सहयोगी देशों से जुड़े संभावित सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए विशेष व्यवस्था रखना था.
इन प्रावधानों में आज भी ‘enemy state’ शब्द मौजूद है. हालांकि, द्वितीय विश्व युद्ध को खत्म हुए 80 साल से ज्यादा समय बीत चुका है. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1995 में भी इन प्रावधानों को अप्रासंगिक बताया था और इन्हें चार्टर से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही थी. इसके बावजूद औपचारिक संशोधन अब तक नहीं हो पाया है.
क्या इस प्रावधान के तहत जापान पर हमला हो सकता है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल है. आम तौर पर ‘Enemy State Clause’ को इस तरह पेश किया जाता है कि इसके आधार पर जापान के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी के बिना सैन्य कार्रवाई की जा सकती है. लेकिन मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कानून की स्थिति इससे ज्यादा जटिल है.
चार्टर का आर्टिकल 107 द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप की गई कार्रवाई को प्रभावित नहीं करने की बात करता है, जबकि आर्टिकल 53 में क्षेत्रीय व्यवस्थाओं से जुड़े प्रावधानों के साथ ‘enemy state’ का संदर्भ आता है. इन धाराओं को आज के समय में किसी देश पर मनमाने तरीके से हमला करने की खुली अनुमति के रूप में नहीं देखा जाता.
यही वजह है कि लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के बीच इन प्रावधानों को अप्रासंगिक मानकर हटाने पर सहमति रही है. इसके बावजूद चार्टर में इनके शब्द बने हुए हैं, जिससे जापान जैसे देशों के लिए यह मुद्दा राजनीतिक और प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण बना हुआ है.
जापान इन्हें हटाने की मांग क्यों कर रहा है?
जापान का तर्क है कि वह अब द्वितीय विश्व युद्ध का ‘enemy state’ नहीं है. युद्ध के बाद जापान ने लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाई और संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनने के साथ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाई. इसलिए जापान का कहना है कि दशकों पुराने युद्धकालीन संदर्भों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर में बनाए रखना मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अनुरूप नहीं है.
सितंबर 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने भी इन प्रावधानों को हटाने की जरूरत पर जोर दिया. जापान लंबे समय से इन धाराओं को यूजलेस और खुद को नीचा दिखाने वाला मानता आया है और चाहता है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर में भी उसकी मौजूदा अंतरराष्ट्रीय स्थिति को दर्शाया जाए.
चीन को जापान की मांग पर आपत्ति क्यों?
चीन इस मुद्दे को केवल चार्टर के पुराने शब्दों को हटाने का मामला नहीं मानता. बीते कुछ वर्षों में जापान ने अपनी रक्षा क्षमताओं का विस्तार किया है और चीन के साथ उसकी सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी बढ़ी हैं. चीन की ओर से जापान के सैन्य विस्तार और ताइवान को लेकर उसके बयानों पर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं.
चीन का रुख यह है कि जापान के इतिहास, सैन्य नीति और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को नजरअंदाज करके केवल ‘Enemy State Clause’ को गैर जरूरी बताना पर्याप्त नहीं है. बीते वर्षों में जापान ने अपनी रक्षा रणनीति में बदलाव किए हैं और लंबी दूरी की मिसाइलों जैसी क्षमताओं को मजबूत करने पर भी काम किया है.
जापान का बढ़ता रक्षा बजट ड्रैगन के लिए चिंता क्यों?
जापान ने अपनी सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव करते हुए रक्षा खर्च बढ़ाने का फैसला किया है. वित्त वर्ष 2026 के लिए जापान का रक्षा बजट करीब 9.04 ट्रिलियन येन बताया गया है, जो उसके सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 2 फीसदी के आसपास है.
जापान ने लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल क्षमताओं को विकसित करने और मौजूदा हथियार प्रणालियों को अपग्रेड करने पर भी जोर दिया है. Type-12 मिसाइलों के उन्नत संस्करण, हाइपरसोनिक हथियारों और ड्रोन आधारित निगरानी नेटवर्क जैसी क्षमताओं पर जापान का ध्यान बढ़ा है.
जापान इन कदमों को अपनी सुरक्षा जरूरतों और क्षेत्रीय खतरों के जवाब के तौर पर देखता है. वहीं चीन इन्हें जापान की सैन्य भूमिका में बदलाव के संकेत के तौर पर देखता है. इसी अंतर की वजह से दोनों देशों के बीच सुरक्षा और इतिहास से जुड़े मुद्दे एक-दूसरे से जुड़ते जा रहे हैं.
ताइवान का मुद्दा इस विवाद को और संवेदनशील क्यों बनाता है?
जापान और चीन के बीच तनाव का सबसे संवेदनशील मुद्दा ताइवान भी है. जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने ताइवान में संभावित संकट को जापान की सुरक्षा से सीधे जुड़ा मुद्दा बताया है. जापानी नेतृत्व की ओर से यह संकेत दिया गया है कि किसी गंभीर ताइवान संकट की स्थिति में जापान और अमेरिका के बीच सुरक्षा सहयोग का महत्व बढ़ सकता है.
चीन ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है और दूसरे देशों की सैन्य भागीदारी का विरोध करता है. इसलिए जापान की ओर से ताइवान को लेकर दिए गए किसी भी सुरक्षा संबंधी बयान को बीजिंग बेहद गंभीरता से लेता है.
क्या जापान अकेले Enemy State Clause’ को हटवा सकता है?
ऐसा संभव नहीं है. यूएन चार्टर में बदलाव के लिए सदस्य देशों और निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया की जरूरत होती है. किसी एक देश के कहने भर से चार्टर की धाराएं खत्म नहीं हो सकतीं.
दिलचस्प बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा पहले ही इन प्रावधानों को अप्रासंगिक मानने की दिशा में कदम उठा चुकी है. 1995 में महासभा ने ‘Enemy State Clauses’ को हटाने की मंशा व्यक्त की थी. 2005 के वर्ल्ड समिट में भी चार्टर से अप्रचलित संदर्भों को हटाने पर सहमति जताई गई थी. लेकिन औपचारिक संशोधन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई.
इसलिए जापान की मौजूदा मांग को एक लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे की अगली कड़ी के रूप में देखा जा सकता है. दूसरी तरफ चीन की आपत्तियां यह दिखाती हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध की विरासत, जापान की वर्तमान सुरक्षा नीति और ताइवान जैसे क्षेत्रीय विवाद आज भी पूर्वी एशिया की राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं.