महिला आरक्षण बिल को लेकर बहस सिर्फ संसद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज और कार्यस्थल की वास्तविक स्थिति को भी सामने लाती है. अर्थशास्त्री मिताली निकोरे का मानना है कि राजनीति और वर्कफोर्स दो अलग मुद्दे हैं. संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना जरूरी है, लेकिन इससे अपने आप सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण नहीं होगा. पंचायत स्तर पर आरक्षण का अनुभव भी यही दिखाता है कि केवल सीटें देने से बदलाव अधूरा रह जाता है, जब तक सामाजिक सोच और बुनियादी ढांचा नहीं बदले. वर्कफोर्स की बात करें तो असली चुनौती महिलाओं की कम भागीदारी, खासकर शहरी क्षेत्रों में, और नौकरी छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति है. शादी, मातृत्व, सुरक्षा, स्किल ट्रेनिंग और सपोर्ट सिस्टम की कमी महिलाओं के करियर में बड़ी बाधाएं बनती हैं. ऐसे में समाधान आरक्षण नहीं, बल्कि बेहतर वर्किंग एनवायरमेंट, सेफ्टी, स्किल डेवलपमेंट और चाइल्ड केयर जैसी सुविधाओं को मजबूत करना है, ताकि महिलाएं बिना रुकावट आगे बढ़ सकें.