अजित पवार के निधन के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा सियासी शून्य पैदा हो गया है. एनसीपी (अजित पवार गुट) के 41 विधायक अचानक नेतृत्वविहीन हो गए हैं, जिससे पार्टी के भविष्य और महायुति सरकार की स्थिरता पर सवाल खड़े हो गए हैं. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या यह हालात एनसीपी की 'घर वापसी' का रास्ता खोलेंगे और क्या शरद पवार एक बार फिर पार्टी को एकजुट करने की भूमिका में आएंगे. अजित पवार की गैरमौजूदगी को महायुति के 'तीसरे इंजन' के फेल होने के तौर पर भी देखा जा रहा है, जिससे सत्ता संतुलन में बड़े उलटफेर की आशंका जताई जा रही है. अजित पवार की सियासी विरासत को लेकर भी मंथन तेज है- क्या सुनेत्रा पवार आगे आएंगी या पार्थ पवार को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी. वहीं बारामती में पैदा हुए शून्य के बीच सुप्रिया सुले को शरद पवार की राजनीतिक विरासत की सबसे मजबूत वारिस माना जा रहा है. वरिष्ठ पत्रकार एस. बालाकृष्णन के मुताबिक अजित पवार ऑल-महाराष्ट्र नेता नहीं थे, उनका प्रभाव पश्चिमी महाराष्ट्र तक सीमित था और उनकी पूरी राजनीतिक ताकत शरद पवार के वर्चस्व से ही आई.