पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी करना अपराध नहीं, ऐसा क्यों बोला मध्यप्रदेश हाई कोर्ट?

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि मुस्लिम पुरुष द्वारा पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी करना अपने आप में बिगैमी (दोहरी शादी) का अपराध नहीं है. अदालत ने स्पष्ट किया कि IPC की धारा 494 व्यक्तिगत कानून के अधीन है और मुस्लिम पर्सनल लॉ पुरुषों को कुछ शर्तों के साथ एक से अधिक विवाह की अनुमति देता है.

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Edited By :  सागर द्विवेदी
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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर कोई मुस्लिम पुरुष अपनी पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी करता है, तो यह स्वतः ही बिगैमी (दोहरी शादी) का अपराध नहीं माना जाएगा. अदालत ने साफ किया कि ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 494 सीधे लागू नहीं होती, क्योंकि यह व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) के अधीन है.

यह फैसला ऐसे समय आया है जब एक महिला ने अपने पति पर दूसरी शादी करने का आरोप लगाते हुए केस दर्ज कराया था. कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए बड़ा कानूनी दृष्टिकोण साफ किया और कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पुरुषों को कुछ शर्तों के साथ एक से अधिक विवाह की अनुमति है.

क्या कहता है कानून और कोर्ट का तर्क?

जस्टिस बीपी शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि IPC की धारा 494 (जो अब भारतीय न्याय संहिता 2023 में शामिल है) व्यक्तिगत कानूनों के अधीन आती है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 'धारा 494 IPC का लागू होना संबंधित पक्षों के व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) पर निर्भर करता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत, एक मुस्लिम पुरुष को एक समय में एक से अधिक पत्नियां रखने की अनुमति है, बशर्ते कि यह उस व्यक्तिगत कानून द्वारा निर्धारित शर्तों के अनुरूप हो.' अदालत ने यह भी साफ किया कि मुस्लिम कानून में दूसरी शादी को केवल इस आधार पर अवैध नहीं माना जा सकता कि पहली शादी अभी जारी है.

क्या दूसरी शादी अपने आप अवैध नहीं मानी जाएगी?

हाई कोर्ट ने इस पर साफ कहा कि 'किसी मुस्लिम पुरुष द्वारा अपनी पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करना केवल इस आधार पर शून्य नहीं माना जाएगा कि पहली शादी अभी भी जारी है. यानी जब तक दूसरी शादी को अवैध साबित करने के अन्य आधार न हों, तब तक इसे IPC की धारा 494 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता. इसी वजह से अदालत ने आरोपी के खिलाफ बिगैमी का केस खारिज कर दिया.

मामला क्या था और महिला ने क्या आरोप लगाए?

यह पूरा मामला एक महिला की शिकायत से शुरू हुआ, जिसने अपने पति पर कई गंभीर आरोप लगाए. महिला का कहना था कि वह संतान पैदा नहीं कर सकी, इसी वजह से उसके साथ क्रूरता, मारपीट और मानसिक प्रताड़ना की गई. महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उसके पति ने दूसरी शादी कर ली और उस पर 'खुला' (आपसी सहमति से तलाक) के लिए दबाव बनाया. इतना ही नहीं, उसने पति पर जहर देकर मारने की धमकी देने और आत्महत्या के लिए उकसाने जैसे आरोप भी लगाए.

ट्रायल कोर्ट ने क्या किया था?

महिला की शिकायत के आधार पर साल 2022 में केस दर्ज किया गया था. इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ कई धाराओं में आरोप तय किए, जिनमें क्रूरता, बिगैमी, गलत तरीके से बंधक बनाना और आपराधिक धमकी शामिल थे.

आरोपी ने हाई कोर्ट में क्या दलील दी?

आरोपी ने हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत उसे एक से अधिक विवाह की अनुमति है, इसलिए उस पर बिगैमी का केस नहीं बनता. उसने यह भी बताया कि फैमिली कोर्ट ने 2025 में उसके पहले विवाह को खत्म (एनल) कर दिया था, जो उसने 2022 में दिए गए दो ‘तलाक’ के आधार पर किया था.

क्या सभी आरोप खत्म हो गए?

हाई कोर्ट ने केवल बिगैमी के आरोप को खारिज किया है. बाकी आरोपों पर सुनवाई जारी रहेगी. कोर्ट ने कहा कि 'आरोपों और जांच के दौरान एकत्रित सामग्री से पहली नजर इन अपराधों के घटित होने का इशारा मिलता है. इसलिए इन्हें कानून के अनुसार ट्रायल कोर्ट द्वारा परखा जाना आवश्यक है.' यानी, क्रूरता, मारपीट, बंधक बनाने और धमकी जैसे आरोपों की जांच और सुनवाई ट्रायल कोर्ट में जारी रहेगी.

किन वकीलों ने पक्ष रखा?

इस मामले में आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल खरे ने पैरवी की, जिनकी मदद अधिवक्ता हरजस सिंह छाबड़ा ने की. वहीं राज्य की ओर से डिप्टी गवर्नमेंट एडवोकेट आत्माराम बैन पेश हुए, जबकि शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता नवीन वासवानी ने पक्ष रखा.

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