भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या दलीलें दी गईं, कैसे तय हुआ एकसाथ पूजा और नमाज का रास्ता?

भोजशाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान हिंदू और मुस्लिम पक्ष ने क्या दलीलें दीं? जानिए बसंत पंचमी पूजा और जुमे की नमाज को लेकर कोर्ट की अहम टिप्पणियां और फैसला.;

( Image Source:  SCI.gov.in )
Edited By :  नवनीत कुमार
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मध्यप्रदेश के धार स्थित भोजशाला को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जब इस साल बसंत पंचमी और जुमे की नमाज एक ही दिन पड़ गई. दोनों धार्मिक आयोजनों के टकराव की आशंका को देखते हुए हिंदू पक्ष ने नई याचिका दायर की. मामला सीधे शीर्ष अदालत के सामने आया, जहां सवाल सिर्फ पूजा या नमाज का नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने का था. सुप्रीम कोर्ट ने इसी संतुलन के आधार पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं.

हिंदू पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने कोर्ट में दलील दी कि बसंत पंचमी कोई सीमित समय का आयोजन नहीं है. उन्होंने कहा कि धार्मिक परंपरा के अनुसार सूर्योदय से सूर्यास्त तक मां सरस्वती की पूजा होती है. ऐसे में पूजा पर किसी तरह की समय-सीमा लगाना आस्था के अधिकार का उल्लंघन होगा. हिंदू पक्ष ने यह भी कहा कि इससे पहले भी जब बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ी, तब विवाद खड़ा हुआ था.

एक दिन सिर्फ पूजा की अनुमति

हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका में साफ मांग की गई थी कि 23 जनवरी, यानी बसंत पंचमी के दिन भोजशाला परिसर में सिर्फ हिंदुओं को पूजा की अनुमति दी जाए. याचिका में मुस्लिम समुदाय को उस दिन नमाज पढ़ने से रोकने का आग्रह किया गया था. याचिकाकर्ता का तर्क था कि एक ही स्थान पर एक साथ दोनों गतिविधियां होने से तनाव और अव्यवस्था की आशंका बनी रहेगी.

जुमे की नमाज भी संवैधानिक अधिकार

मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ नेता और वकील सलमान खुर्शीद ने कोर्ट में दलील रखी कि जुमे की नमाज मुस्लिम समुदाय के लिए उतनी ही अनिवार्य है, जितनी बसंत पंचमी हिंदुओं के लिए. उन्होंने कहा कि किसी एक समुदाय को पूरी तरह रोकना संविधान के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ होगा. इस दलील के साथ मुस्लिम पक्ष ने संतुलित व्यवस्था की बात कही.

समाधान टकराव नहीं, संतुलन है

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने अहम सवाल उठाया कि क्या दोनों समुदाय एक ही दिन प्रार्थना नहीं कर सकते. उन्होंने कहा कि अदालत का मकसद किसी एक पक्ष को तरजीह देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कानून-व्यवस्था बनी रहे. CJI ने यह भी पूछा कि राज्य सरकार ने उस दिन के लिए क्या खास इंतजाम किए हैं और क्या विशेष व्यवस्था संभव है.

कानून-व्यवस्था हमारी जिम्मेदारी

मध्यप्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि किसी भी स्थिति में कानून-व्यवस्था बिगड़ने नहीं दी जाएगी. उन्होंने कहा कि प्रशासन के पास पर्याप्त इंतजाम हैं और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त सुरक्षा बल भी तैनात किए जाएंगे. सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन किया जाएगा.

नमाज पहले या पूजा पहले?

हिंदू पक्ष ने सुझाव दिया कि नमाज शाम पांच बजे के बाद कराई जा सकती है और तब तक हिंदुओं को पूजा की पूरी छूट दी जाए. इस पर चीफ जस्टिस ने प्रतिप्रश्न किया कि दोपहर 1 बजे तक हिंदू पूजा क्यों नहीं कर सकते. कोर्ट ने व्यावहारिक समाधान की ओर बढ़ते हुए कहा कि 1 से 3 बजे तक नमाज होगी और उसके बाद फिर से पूजा जारी रह सकती है.

दोनों धर्म, अलग समय और अलग व्यवस्था

सभी दलीलों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि भोजशाला में बसंत पंचमी की पूजा और जुमे की नमाज दोनों होंगी. नमाज के लिए 1 से 3 बजे तक का समय तय किया गया और मंदिर परिसर में ही अलग स्थान निर्धारित करने के निर्देश दिए गए. पूजा के लिए कोई समय-सीमा नहीं रखी गई, लेकिन दोनों समुदायों के लिए विशेष पास और अलग-अलग व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने को कहा गया. इस फैसले के जरिए कोर्ट ने साफ संदेश दिया कि आस्था के साथ-साथ शांति भी सर्वोपरि है.

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