न साथ रहे, न कभी बने शारीरिक संबंध! शादी के 7 दिन बाद तलाक लेने वाले कपल पर दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या कहा?
दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ किया कि अगर पति-पत्नी के बीच कभी शारीरिक संबंध न बने और वे साथ न रहे, तो 1 साल का वेटिंग पीरियड जरूरी नहीं. यह फैसला वैवाहिक मामलों में राहत देने वाला और कानून की व्यावहारिक समझ को दर्शाता है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में एक बहुत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक फैसला सुनाया है, जो वैवाहिक मामलों में काफी राहत देने वाला है. कोर्ट ने कहा कि अगर कोई शादी सिर्फ कागजों पर हुई हो, लेकिन असल में पति-पत्नी के बीच कभी कोई शारीरिक संबंध न बना हो और वे शादी के तुरंत बाद ही अलग हो गए हों, तो ऐसी स्थिति में वैवाहिक रिश्ता कभी सही मायने में शुरू ही नहीं हुआ माना जाएगा. ऐसे मामलों में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 14 के तहत तलाक के लिए जरूरी एक साल की वेटिंग पीरियड को लागू करना जरूरी नहीं है.
क्या हुआ था मामले में?
यह मामला एक ऐसे दंपति का था, जिनकी शादी मार्च 2025 में हुई थी. दोनों ने आर्य समाज मंदिर में शादी की और उसे रजिस्टर भी कराया. लेकिन शादी के बाद वे कभी एक दिन भी साथ नहीं रहे, न ही कोई शारीरिक संबंध बना. लाइव एंड लॉ में छपी खबर के मुताबिक, यह जोड़ा सिर्फ 7 दिन तक साथ रहा. इसके बाद दोनों अपनी-अपनी पैतृक घरों में ही रहे. अलग रहते ही शादी के सिर्फ 7 महीने के अंदर ही दोनों ने आपसी सहमति से तलाक लेने का फैसला किया. उन्होंने धारा 13-B के तहत आपसी सहमति से तलाक की याचिका दाखिल की, लेकिन चूंकि शादी को एक साल नहीं हुए थे, इसलिए उन्होंने धारा 14 के तहत एक साल की वेटिंग पीरियड (प्रतीक्षा अवधि) माफ करने की अर्जी भी दी. फैमिली कोर्ट ने उनकी इस अर्जी को खारिज कर दिया और कहा कि एक साल का इंतजार करना जरूरी है. इस फैसले के खिलाफ दंपति ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की.
हाई कोर्ट की बेंच ने क्या कहा?
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेणु भटनागर की बेंच ने फैमिली कोर्ट के फैसले को पलट दिया. कोर्ट ने साफ-साफ कहा:जब शादी सिर्फ नाम की हो, कागजों पर हो, लेकिन असल जिंदगी में पति-पत्नी के बीच कोई रिश्ता न बने न शारीरिक संबंध, न साथ रहना, न कोई वैवाहिक जीवन तो ऐसे में वैवाहिक रिश्ता कभी विकसित ही नहीं हुआ. कोर्ट ने कहा, 'शारीरिक संबंध की पूरी तरह अनुपस्थिति और शादी के तुरंत बाद अलग हो जाना यह साबित करता है कि वैवाहिक संबंध कभी सार्थक रूप से शुरू ही नहीं हुआ.' ऐसे में जबरन एक साल इंतजार करवाना बेकार है, क्योंकि सुलह या पुनर्विचार की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती. धारा 14 में पहले से ही एक प्रावधान है, जो 'असाधारण कठिनाई' के मामलों में एक साल की अवधि माफ करने की इजाजत देता है. कोर्ट ने इस मामले को ठीक इसी श्रेणी में रखा और कहा कि एक साल इंतजार करवाने से दोनों पक्षों को बेवजह का मानसिक कष्ट होगा. कोर्ट ने दोनों पक्षों से चैंबर में बात की और संतुष्ट होकर फैसला दिया कि दोनों की आपसी सहमति सच्ची है और शादीशुदा जीवन की कोई संभावना नहीं बची है. इसलिए कानूनी प्रक्रिया को लंबा खींचना सही नहीं.
फैसले का नतीजा
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 9 दिसंबर 2025 के फैसले को रद्द कर दिया. धारा 14 की अर्जी मंजूर कर ली और दंपति को तुरंत एक साल पूरा होने से पहले आपसी सहमति से तलाक की याचिका दाखिल करने की इजाजत दे दी. मामले को फैमिली कोर्ट में वापस भेज दिया गया है, ताकि वहां तेजी से सुनवाई हो और फैसला जल्दी आए. यह फैसला दिखाता है कि कानून इंसानों की वास्तविक परिस्थितियों को समझता है. अगर कोई रिश्ता कभी शुरू ही न हुआ हो, तो उसे नाम के लिए जबरन जारी रखना न तो सही है और न ही न्यायसंगत.