सब्जी बेची, ई-रिक्शा चलाया, पोलियो से लड़ी जंग....कैसे बिहार का झंडू कुमार बने पावरलिफ्टिंग चैंपियन, भारत के लिए जीता मेडल?
सब्जी बेचने और ई-रिक्शा चलाने से लेकर पोलियो से संघर्ष करते हुए बिहार के झंडू कुमार ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए ब्रॉन्ज मेडल जीतकर इतिहास रच दिया. जानें उनकी प्रेरणादायक कहानी.
Jhandu Kumar Power Lifting: भारत के पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए देश को पहला आधिकारिक पदक दिलाया है. उन्होंने पुरुषों के हेवीवेट वर्ग में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर भारत का खाता खोला. झंडू कुमार का वजन 72.4 किलोग्राम था. उन्होंने अपनी दूसरी कोशिश में 190 किलोग्राम वजन उठाया, जबकि तीसरे प्रयास में 196 किलोग्राम उठाने की कोशिश की, लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो सके. मुकाबले के दौरान झंडू लंबे समय तक पहले स्थान पर बने रहे, लेकिन अंत में तीसरे स्थान पर रहकर कांस्य पदक अपने नाम किया.
झंडू कुमार बिहार के नालंदा जिले के हरनौत गांव के रहने वाले हैं. वह एक साधारण परिवार से आते हैं. उनके पिता सब्जी बेचने का काम करते हैं. पांच साल की उम्र में पोलियो से प्रभावित होने के बावजूद झंडू ने आर्थिक और शारीरिक चुनौतियों को पार करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर तक का सफर तय किया.
कैसा रहा सब्जी की दुकान से जिम तक का सफर?
झंडू कुमार की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा परिवार का खर्च चलाने और अपने खेल के बीच संतुलन बनाने में बीता. उनका दिन सब्जी मंडी से शुरू होता था और शाम जिम में खत्म होती थी. उन्होंने बताया था कि वह रोज करीब 20 किलोमीटर दूर बिहार शरीफ जाकर सब्जियां खरीदते थे. फिर उन्हें हरनौत बाजार लाकर बेचते थे. शाम करीब 4 बजे काम खत्म होने के बाद वह सीधे जिम जाकर ट्रेनिंग करते थे.
कोरोना महामारी के दौरान हरनौत बाजार में ओवरब्रिज के निर्माण की वजह से उनके परिवार की सब्जी की दुकान कुछ समय के लिए बंद हो गई. परिवार की आर्थिक स्थिति और मुश्किल हो गई. ऐसे में झंडू ने परिवार का खर्च चलाने के लिए ई-रिक्शा चलाना शुरू कर दिया. हालांकि, इस दौरान भी उन्होंने अपनी ट्रेनिंग नहीं छोड़ी. उनके लिए भारत का प्रतिनिधित्व करने का सपना सबसे बड़ी प्राथमिकता बना रहा.
पैरा पावरलिफ्टिंग नहीं था पहला खेल?
झंडू कुमार ने अपने खेल करियर की शुरुआत पैरा पावरलिफ्टिंग से नहीं की थी. साल 2017 में उन्होंने F55 वर्ग में शॉट पुट और डिस्कस थ्रो से खेल की शुरुआत की. इन दोनों प्रतियोगिताओं में उन्होंने जिला और राज्य स्तर पर कई पदक भी जीते.
कैसे जिम ने बदली ज़िंदगी की दिशा?
जिम में स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के दौरान झंडू की रुचि पावरलिफ्टिंग की ओर बढ़ी. इसके बाद एक राज्य स्तरीय प्रतियोगिता के दौरान उन्हें पैरा पावरलिफ्टिंग अपनाने की सलाह दी गई और यहीं से उनके करियर ने नई दिशा पकड़ ली.
अंतरराष्ट्रीय स्तर की तैयारी के लिए जरूरी पोषण का खर्च उठाना झंडू के लिए आसान नहीं था. वह रोज ई-रिक्शा चलाकर या सब्जी बेचकर करीब 400 से 500 रुपये कमाते थे, जिससे मुश्किल से घर का खर्च चल पाता था. वहीं, सिर्फ प्रोटीन सप्लीमेंट का खर्च ही करीब 2,000 रुपये था.
जब झंडू ने बेचा अपना रिक्शा....
साल 2023 में राष्ट्रीय पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए झंडू कुमार ने बड़ा फैसला लिया. प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए उन्होंने अपना ई-रिक्शा तक बेच दिया. हालांकि, यह दांव शुरुआत में सफल नहीं रहा, क्योंकि वह प्रतियोगिता में एक भी सफल लिफ्ट दर्ज नहीं कर पाए. पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता में नहीं मिली सफलता, लेकिन यहीं बदली किस्मत
कैसे एक मैच ने बदली किस्मत?
राष्ट्रीय चैंपियनशिप में निराशा हाथ लगने के बावजूद झंडू की प्रतिभा पर पैरालंपिक कांस्य पदक विजेता राजिंदर सिंह राहेलू की नजर पड़ी. उन्होंने झंडू को स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के गांधीनगर स्थित नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (NCOE) में प्रशिक्षण के लिए बुलाया.
राजिंदर सिंह राहेलू की देखरेख में प्रशिक्षण लेने के बाद झंडू कुमार भारत के शीर्ष पैरा पावरलिफ्टरों में शामिल हो गए. साल 2025 की राष्ट्रीय चैंपियनशिप में उन्होंने 205 किलोग्राम वजन उठाकर नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया. इसके कुछ ही महीनों बाद उन्होंने खेलो इंडिया पैरा गेम्स में 206 किलोग्राम वजन उठाकर अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया.
पहले भी जीत चुके हैं अंतरराष्ट्रीय पदक
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में कांस्य पदक जीतने से पहले भी झंडू कुमार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन कर चुके हैं. उन्होंने बीजिंग वर्ल्ड कप 2025 और एशियन एंड ओशिनिया चैंपियनशिप 2026 में भी कांस्य पदक जीता था. अब कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में कांस्य पदक जीतकर झंडू कुमार ने न केवल भारत को पहला आधिकारिक पदक दिलाया, बल्कि अपने संघर्ष, मेहनत और कभी हार न मानने वाले जज्बे से लाखों लोगों के लिए प्रेरणा भी बन गए.