शारदीय नवरात्रि में अखंड ज्योति जलाते हैं तो इन बातों का रखें ध्यान, घी-तेल के दीपक से लेकर बुझाने तक जानें नियम
शारदीय नवरात्रि में अखंड ज्योति को मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा, संकल्प और साधना का प्रतीक माना जाता है, लेकिन इसे जलाते समय कुछ धार्मिक परंपराओं और सुरक्षा सावधानियों का ध्यान रखना जरूरी है. मान्यता के अनुसार घी का दीपक दाईं और तेल का दीपक बाईं ओर रखा जाता है.
शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना के दौरान अखंड ज्योति जलाने की परंपरा है. इसे भक्त अपने संकल्प और देवी के प्रति श्रद्धा का प्रतीक मानते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, पूजा स्थल पर लगातार जलने वाली ज्योति से सकारात्मक और पवित्र वातावरण बना रहता है.
हालांकि, अखंड ज्योति जलाते समय कुछ नियमों और सावधानियों का ध्यान रखना जरूरी है. आइए, इनके बारे में जानते हैं...
अखंड ज्योति जलाने का नियम
अखंड ज्योति जलाने से पहले भगवान गणेश, भगवान शिव और मां दुर्गा का ध्यान करना शुभ माना जाता है. इसके बाद श्रद्धा के साथ दीपक प्रज्वलित करें. इस दौरान मां दुर्गा के मंत्र का जाप भी किया जा सकता है,
ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कृपालिनी.
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते.
धार्मिक परंपरा के अनुसार, घी का दीपक दाईं ओर और तेल का दीपक बाईं ओर रखा जाता है. जिस संकल्प के लिए अखंड ज्योति जलाई गई है, उसे पूरा होने तक ज्योति को जलाए रखने का प्रयास करना चाहिए.
अखंड ज्योति को अकेला न छोड़ें
अखंड ज्योति की नियमित देखभाल जरूरी है. दीपक में घी या तेल पर्याप्त मात्रा में रहे और उसे तेज हवा से सुरक्षित स्थान पर रखें. दीपक को बच्चों, पालतू जानवरों और ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखना चाहिए. आग से बचाव के लिए दीपक को सुरक्षित और स्थिर स्थान पर रखें.
संकल्प पूरा होने के बाद क्या करें?
संकल्प पूरा होने के बाद अखंड ज्योति को लेकर अपनी पारिवारिक या धार्मिक परंपरा का पालन करें. कई मान्यताओं में दीपक को स्वाभाविक रूप से शांत होने देने की बात कही गई है. ज्योति को फूंक मारकर बुझाने से बचने की परंपरा है.
अखंड ज्योति का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं में अखंड ज्योति को आध्यात्मिक शांति, सकारात्मकता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य श्रद्धा, साधना और पूजा से जुड़ा है. ज्योति जलाने से किसी बीमारी, दोष या ग्रह के प्रभाव को निश्चित रूप से दूर करने जैसे दावों को धार्मिक मान्यता के रूप में ही देखना चाहिए.