सुहागिन महिलाओं के लिए करवा चौथ का त्योहार बहुत ही खास और पवित्र माना जाता है. इस दिन महिलाएं अपनी पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और संपन्नता के लिए सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं. सुबह सरगी के साथ व्रत शुरू होता है जो चांद के दर्शन करने के बाद अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार करवा चौथ का त्योहार बिना छलनी, दीपक, सींक, करवा और चांद के दर्शन के पूरा नहीं माना जाता है.

आइए जानते हैं क्या है इनका महत्व

करवा का महत्व

करवा का अर्थ है,'करवा' यानी मिट्टी का वह बर्तन जिसे अग्रपूज्य गणेशजी का स्वरूप माना गया है. गणेशजी जल तत्व के कारक हैं और करवा में लगी हुई टूंटी गणेशजी की सूंड का प्रतीक मानी गई है. करवा चौथ की पूजा में मिट्टी के करवे में जल भरकर रखा जाता है. इसे शुभता और मंगल का प्रतीक माना जाता है. एक धार्मिक मान्यता के अनुसार, करवा माता ने अपने पति को मगरमच्छ से बचाने के लिए यमराज से प्रार्थना की थी. पूजा में करवा माता की तस्वीर रखकर उनकी कथा सुनी जाती है.

दीपक और छलनी का महत्व

दीपक की रोशनी को ज्ञान, सकारात्मकता और शुभता का प्रतीक माना जाता है. करवा चौथ पर महिलाएं छलनी से पहले चंद्रमा और फिर पति का चेहरा देखती हैं. इसके पीछे वीरवती की कथा प्रचलित है. मान्यता है कि वीरवती के भाइयों ने छलनी में दीपक रखकर चांद निकलने का भ्रम पैदा किया था, जिसके बाद वीरवती ने व्रत खोल लिया.

सींक का महत्व

करवा चौथ की पूजा में इस्तेमाल होने वाली सींक को करवा माता की शक्ति का प्रतीक माना जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, जब मगरमच्छ ने करवा के पति का पैर पकड़ लिया, तो उन्होंने अपने तप और साहस से पति की रक्षा के लिए यमराज से प्रार्थना की. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर यमराज ने उनके पति को जीवनदान दिया. इसी मान्यता के कारण पूजा में सींक का विशेष महत्व बताया जाता है.

कलश और पूजा की थाली का महत्व

करवा चौथ पर मिट्टी या तांबे के पात्र से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है. धार्मिक मान्यताओं में कलश को सुख-समृद्धि और मंगल का प्रतीक माना गया है. पूजा की थाली में रोली, अक्षत, दीपक, फूल, मिठाई और जल रखा जाता है. कुछ परंपराओं में करवे के ऊपर जौ भी रखे जाते हैं, जिन्हें समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है.