2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन जब आजादी की लड़ाई से जुड़े किस्से सामने आते हैं, तो चरखे का जिक्र जरूर होता है. लेकिन अक्सर लोग कहते हैं कि सिर्फ चरखे से आजादी नहीं आई. इसे लेकर लोगों के अलग-अलग विचार हैं. कई लोग कहते हैं कि गांधी के नेतृत्व में ही आजादी मिली, वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि गांधी को ज्यादा क्रेडिट दिया गया. इस बहस पर जाने-माने UPSC शिक्षक, मोटिवेशनल स्पीकर, शिक्षाविद् अवध ओझा और लेखक, वेदांत शिक्षक और IIT-IIM से पढ़ने वाले आचार्य प्रशांत ने अपने विचार रखे हैं.

अवध ओझा का कहना है कि चरखे ने ही भारत को आजादी दिलाई है, क्योंकि चरखे ने भारत के किसानों को आर्थिक तौर पर स्वतंत्र बनाने का काम किया था. हालांकि वो ये भी कहते हैं कि आजादी में हर किसी का योगदान है. लोगों का, क्रांतिकारियों का, लोगों ने अपनी जान तक की, लेकिन नेतृत्व गांधी ने ही किया. जनजागरण का काम गांधी ने ही किया. उनके कहने पर ही लोग सड़क पर आए वो भी तब जब भारत एक देश नहीं था. 90 प्रतिशत लोग अनपढ़ और आर्थिक रूप से कमजोर थे.

वो कहते हैं कि कहानी सिर्फ धागा कातने की नहीं थी, बल्कि लोगों को अपने काम और कमाई से जोड़ने की थी. चरखे से तैयार खादी और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार को आजादी के आंदोलन से जोड़ा गया. यानी अंग्रेजों से मुकाबला केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि बाजार और कारोबार के स्तर पर भी किया गया. इसी Economic Tactics के जरिए लोगों को आंदोलन से जोड़ने और ब्रिटिश आर्थिक हितों पर दबाव बनाने की कोशिश की गई.

क्या थी गांधी की इकोनॉमिक टेक्टिक्स?

अवध ओझा ने बताया कि जो लोग पूछते हैं कि चरखे से आजादी कैसे आई, उन्हें इसके आर्थिक पक्ष को समझना चाहिए. उनके मुताबिक चरखे ने भारत के किसानों को आर्थिक आजादी दी. साल 1924 में  ऑल इंडिया खादी बोर्ड बनाया गया था.  इस बोर्ड ने भारत के हर शहर में खादी आश्रम खोला, जहां डे टू डे गुड्स जैसी चीजें बेची जाती थीं. 

सिर्फ खादी ही नहीं बेचा गया से सामान

अवध ओझा के अनुसार गांधी जी की रणनीति केवल कपड़ा बनाने तक नहीं रुकी. उन्होंने बताया कि गांधी जी ने लोगों को तेल, साबुन जैसी चीजें बनाने और उन्हें खादी से जुड़े बिक्री केंद्रों के जरिए बाजार तक पहुंचाने के लिए प्रेरित किया गया. इस तरह गांधी जी ने भारत के किसानों का आर्थिक हित कांग्रेस से जोड़ दिया. इसे आसान शब्दों में कहें, तो अगर किसी व्यक्ति का आपसे आर्थिक हित जुड़ जाएगा, तो वह शख्स आपका समर्थक हो जाएगा. यही है R(रिलेशन)=I(इंटरेस्ट). यानी जहां आपका लाभ है, वहीं, संबध बनाएं और यही काम गांधी जी ने किया.

क्या है होली पर विदेश कपड़े जलाना?

वहीं आचार्य प्रशांत ने एक वीडियो में बताया कि उस समय ब्रिटिश साम्राज्य आर्थिक ताकत पर खड़ा था. गांधी जी का मानना था कि वह गोली चलवाएंगे, तो उनके ही करोड़ों लोग मरेंगे. ऐसे में उन्हें वहां मारेंगे, जहां उन्हें चोट लगेगी. इसलिए गांधी जी ने ऐसे तरीकों को चुना जिनसे अंग्रेजी कारोबार पर असर पड़े.  विदेशी कपड़ों का बहिष्कार, खादी को बढ़ावा देना और बाद में नमक सत्याग्रह इसी आर्थिक दबाव की रणनीति ने भारत को आजादी दिलाने का काम किया. आचार्य प्रशांत के अनुसार होली पर विदेशी कपड़ों को जलाने जैसे कदमों का निशाना ब्रिटिश कपड़ा उद्योग था.

लंकाशायर तक पहुंची खादी की बात

इसी संदर्भ में आचार्य प्रशांत गांधी जी के 1931 के लंकाशायर दौरे का जिक्र करते हैं. उनका कहना है कि गांधी जी ने ऐसी जगह दबाव बनाने की कोशिश की, जहां ब्रिटिश आर्थिक हित जुड़े थे. यानी लड़ाई का तरीका केवल राजनीतिक विरोध नहीं था, बल्कि खरीद-बिक्री और कारोबार को भी आंदोलन का हिस्सा बनाया गया. गांधी जी के ब्रिटेन दौरे और लंकाशायर के कपड़ा उद्योग से जुड़े लोगों से उनकी मुलाकात का ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी मौजूद है. आचार्य प्रशांत यह भी कहते हैं कि आजादी को केवल गांधी जी के नाम से जोड़ना या उनके योगदान को पूरी तरह नकार देना, दोनों ही बातें गलत है. .