विशाखापत्तनम में कथित जासूसी के मामले की जांच कर रही एजेंसियों ने दावा किया है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों से जुड़े ऑपरेटिव्स ने महिलाओं की फर्जी पहचान का इस्तेमाल कर आम नागरिकों और नौसेना से जुड़े लोगों को अपने जाल में फंसाया. आरोप है कि पहले सोशल मीडिया के जरिए दोस्ती की गई, फिर निजी बातचीत और अश्लील सामग्री के जरिए लोगों को ब्लैकमेल किया गया और उनसे नौसेना के जहाजों, पनडुब्बियों और अधिकारियों की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी हासिल की गई.

जांचकर्ताओं के मुताबिक, करीब छह महीने पहले एक महिला ने खुद को शिपिंग कंपनी की कर्मचारी बताकर 28 वर्षीय अन्नम साई वरप्रसाद से सोशल मीडिया पर संपर्क किया था. वरप्रसाद विशाखापत्तनम नेवल बेस पर कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर नौसेना अधिकारियों की गाड़ियां चलाता था. महिला ने उसे बताया कि वह पड़ोसी राज्य से है. शुरुआत में वरप्रसाद को बातचीत पर शक हुआ, लेकिन इसके बावजूद दोनों के बीच बातचीत जारी रही.

महिला ने कैसे जाल में फंसाया?

जांच के अनुसार, शुरुआत में महिला ने वरप्रसाद से उसकी निजी जिंदगी के बारे में सवाल किए. उसने पूछा कि वह कहां रहता है और उसकी शादी क्यों नहीं हुई. इसके बाद बातचीत उसके काम तक पहुंची. महिला ने उसकी नौकरी, सैलरी और वह किस तरह की गाड़ियां चलाता है, इसके बारे में जानकारी मांगी.

जांचकर्ताओं का दावा है कि बातचीत आगे बढ़ने के बाद महिला ने वरप्रसाद को अश्लील सामग्री भेजी और जल्द ही विशाखापत्तनम आकर उससे मिलने का वादा किया. इसके बाद कथित तौर पर उसके खिलाफ इसी बातचीत का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए किया गया. उसे धमकी दी गई कि अगर उसने सहयोग नहीं किया तो उसके नियोक्ताओं को इसकी जानकारी दी जाएगी और उसे गिरफ्तार कराया जा सकता है.

फिर शुरू हुआ जानकारी मांगने का सिलसिला...

इसके बाद कथित ब्लैकमेल के जरिए वरप्रसाद से नौसेना से जुड़ी जानकारी मांगी जाने लगी. जांचकर्ताओं के मुताबिक, उससे अलग-अलग नौसैनिक संपत्तियों की लोकेशन और अधिकारियों की तैनाती से संबंधित जानकारी हासिल की गई. हालांकि, अधिकारियों के मुताबिक वरप्रसाद के पास केवल बेसिक सिक्योरिटी क्लीयरेंस था और वह क्लासिफाइड इन्फोर्मेशन तक सीधे तौर पर पहुंच नहीं रखता था. उसके पास नौसेना के जहाजों के डॉकिंग या पनडुब्बियों के आने-जाने जैसी गतिविधियों को देखने और रिपोर्ट करने की भी सीमित क्षमता थी.

जांच के मुताबिक, वरप्रसाद और महिला के बीच बातचीत पहले सोशल मीडिया पर हुई और बाद में WhatsApp पर पहुंच गई. अब जांच एजेंसियां उसके फोन की भी जांच कर रही हैं. अधिकारियों के अनुसार, यह पता लगाया जा रहा है कि क्या उसे क्रिप्टोकरेंसी के जरिए कोई भुगतान मिला था.

क्या किसी और का नाम भी आया सामने?

जांच के दौरान वरप्रसाद से जुड़े एक अन्य व्यक्ति का नाम भी सामने आया. अधिकारियों के अनुसार, उसने 31 वर्षीय ट्रेनी नाविक प्रदीप मुखर्जी के बारे में जानकारी साझा की थी. वरप्रसाद की मुलाकात पहले मुखर्जी से विशाखापत्तनम नेवल बेस पर हुई थी. जांचकर्ताओं का आरोप है कि मुखर्जी को भी पाकिस्तान स्थित एक खुफिया ऑपरेटिव ने निशाना बनाया था. इस मामले में ऑपरेटिव ने खुद को मेडिकल प्रोफेशनल बताया था.

जांचकर्ताओं के मुताबिक, मुखर्जी और कथित ऑपरेटिव के बीच भी निजी और अश्लील संदेशों का आदान-प्रदान हुआ. इसके बाद उसे गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई की धमकी दी गई. आरोप है कि दबाव में मुखर्जी ने विशाखापत्तनम और कोयंबटूर की सुविधाओं से जुड़ी जानकारी साझा की. उस समय वह कोयंबटूर में एक ट्रेनिंग कोर्स कर रहा था.

अधिकारियों ने क्या कहा

अधिकारियों का यह भी आरोप है कि मुखर्जी से पाकिस्तानी ऑपरेटिव्स के WhatsApp अकाउंट एक्टिवेट करने के लिए OTP साझा करने को मजबूर किया गया. जांचकर्ताओं के अनुसार, जब उसने सहयोग बंद करने की कोशिश की तो उसे एक वॉइस कॉल के जरिए गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई.

क्या था इन व्हाट्स एप नंबरों का मकसद?

जांच एजेंसियों का दावा है कि इन WhatsApp नंबरों का इस्तेमाल आगे दूसरे लोगों को फंसाने के लिए किया गया. इसी तरीके से कम से कम 16 अन्य लोगों को निशाना बनाए जाने की बात सामने आई है. जांचकर्ताओं के मुताबिक, इन लोगों की पोस्टिंग केरल, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, गोवा, दिल्ली, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ और बिहार में थी. आरोप है कि उनसे भी नौसेना के जहाजों और पनडुब्बियों के आने-जाने तथा उनकी गतिविधियों से जुड़ी जानकारी मांगी गई.

आंध्र प्रदेश काउंटर इंटेलिजेंस सेल के अधिकारियों के मुताबिक, जब यह स्थापित हुआ कि वरप्रसाद और मुखर्जी ने कथित तौर पर जानकारी साझा करने के साथ दूसरे लोगों को फंसाने में भी मदद की, तो दोनों के खिलाफ 2 सितंबर को मामला दर्ज किया गया. इसके बाद दोनों पर निगरानी रखी गई और उनकी गतिविधियों पर नजर रखी गई.

क्या है ऑपरेशन फायरवॉल?

जांच के तहत 1 अक्टूबर को 18 लोगों के घरों और ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की गई. इस कार्रवाई को 'ऑपरेशन फायरवॉल 2026' नाम दिया गया. अधिकारियों के मुताबिक, इस अभियान में 12 टीमें शामिल थीं. इनमें कई राज्यों की एंटी-टेररिस्ट स्क्वॉड के अधिकारी, नौसेना के खुफिया अधिकारी और स्थानीय पुलिस भी शामिल थी. छापेमारी के दौरान मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और दस्तावेज जब्त किए गए.

अधिकारियों के मुताबिक, इन 18 लोगों में 13 नौसेना कर्मी भी शामिल थे. जांच एजेंसियां अब 16 लोगों की भूमिका की जांच कर रही हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कथित नेटवर्क में उनकी क्या भूमिका थी और उन्होंने किस स्तर तक जानकारी साझा की. फिलहाल वरप्रसाद को विशाखापत्तनम और मुखर्जी को कोयंबटूर से गिरफ्तार किया जा चुका है. जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क और इसके जरिए कथित तौर पर हासिल की गई जानकारी की आगे जांच कर रही हैं.