24 सितंबर 2025 को लेह में क्या हुआ था, जिसकी तुलना सोनम वांगचुक ने चीन के तिब्बती दमन से कर दी, तिब्बत की पूरी कहानी
सोनम वांगचुक ने लद्दाख की स्थिति की तुलना चीन के कब्जे वाले तिब्बत से की, जिस पर CTA ने “गहरी चिंता” जताई. जानिए क्या कहा वांगचुक ने और चीन-तिब्बत विवाद की पूरी कहानी.
लद्दाख के सामाजिक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के एक बयान को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. वांगचुक ने लद्दाख की मौजूदा स्थिति की तुलना चीन के नियंत्रण वाले तिब्बत से की थी. उनके इस बयान के अगले ही दिन सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन (CTA) ने प्रतिक्रिया दी और इस तुलना को “गलत और अनुचित” बताया.
CTA ने कहा कि वह वांगचुक के बयान को लेकर “गहरी चिंता” जताता है. दूसरी ओर, वांगचुक ने यह टिप्पणी लद्दाख में पिछले साल हुई हिंसा की पहली बरसी पर आयोजित कार्यक्रम में की थी. उन्होंने अपने भाषण में लद्दाख के लोगों की मांगों, पिछले साल हुई हिंसा और वहां पैदा हुए डर का जिक्र किया था.
क्या कहा था सोनम वांगचुक ने?
गुरुवार को लेह में आयोजित कार्यक्रम में लोगों को संबोधित करते हुए सोनम वांगचुक ने कहा कि लद्दाख ने लोकतंत्र की वजह से भारत को चुना था. उनका कहना था कि लोग चाहते थे कि वे यहां सिर ऊंचा कर के रह सकें. इसके बाद उन्होंने लद्दाख की स्थिति की तुलना तिब्बत से की. वांगचुक ने कहा कि लद्दाख पर ऐसा जुल्म किया जा रहा है, “जो चीन तिब्बत पर नहीं कर रहा है.”
वांगचुक की यह टिप्पणी पिछले एक साल के दौरान लद्दाख में पैदा हुए डर और 24 सितंबर 2025 को हुई हिंसा के संदर्भ में थी. उन्होंने इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग भी की और पिछले साल हुई घटना को “नरसंहार” बताया.
24 सितंबर 2025 को लद्दाख में क्या हुआ था?
24 सितंबर 2025 को लेह में प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़क गई थी. इस घटना में पुलिस फायरिंग के दौरान चार नागरिकों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे. इन प्रदर्शनों के पीछे लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा देने की मांग प्रमुख थी. लद्दाख को 2019 में केंद्रशासित प्रदेश बनाए जाने के बाद से स्थानीय संगठन इन मांगों को उठाते रहे हैं. लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस जैसे स्थानीय संगठनों की प्रमुख मांगों में लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देना शामिल रहा है.
क्यों हो रही थी छठी अनुसूची की मांग?
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि लद्दाख की डोमोदग्राफी, संस्कृति और जमीन से जुड़े अधिकारों की सुरक्षा के लिए क्षेत्र को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए. इसके अलावा स्थानीय युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण और लेह तथा कारगिल के लिए अलग लोकसभा सीट की मांग भी उठाई गई थी.
इन मांगों को लेकर सोनम वांगचुक और दूसरे स्थानीय लोग भूख हड़ताल पर भी बैठे थे. इसके बाद 24 सितंबर 2025 को प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प हुई, जो बाद में हिंसक हो गई.
प्रदर्शन के दौरान भीड़ की ओर से सरकारी कार्यालयों और वाहनों पर पथराव और आगजनी की घटनाएं हुईं. हिंसा और सुरक्षा बलों की कार्रवाई के दौरान चार लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हुए.
हिंसा को लेकर क्या-क्या आरोप लगे?
इस घटना को लेकर प्रदर्शनकारियों और केंद्र सरकार की ओर से अलग-अलग दावे किए गए. प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बलों पर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें उठा रहे निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध गोली चलाने का आरोप लगाया. सोनम वांगचुक ने दावा किया कि जिन लोगों की मौत हुई, उन्हें पैरों पर नहीं बल्कि सीधे सीने और पीठ पर गोली मारी गई.
दूसरी ओर, केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय ने हिंसा के लिए वांगचुक के बयानों और उनके अनशन को जिम्मेदार ठहराया था. इसके बाद उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया गया और उन्हें जेल भेजा गया. वांगचुक करीब छह महीने तक जेल में रहे.
अब तिब्बत से तुलना पर क्यों विवाद हुआ?
वांगचुक ने लद्दाख की स्थिति की तुलना चीन के नियंत्रण वाले तिब्बत से की है. इसी तुलना पर सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन यानी CTA ने आपत्ति जताई है. CTA ने वांगचुक की टिप्पणी को “गलत और अनुचित” बताया और कहा कि वह इस तुलना को लेकर “गहरी चिंता” जताता है. यही बयान अब विवाद का केंद्र बन गया है. इसे समझने के लिए तिब्बत और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद को समझना जरूरी है.
चीन और तिब्बत का विवाद क्या है?
तिब्बत और चीन के बीच विवाद मुख्य रूप से तिब्बत की राजनीतिक और कानूनी स्थिति को लेकर है. चीन का दावा है कि तिब्बत 13वीं शताब्दी के मध्य से ही चीन का हिस्सा रहा है. इसके विपरीत, तिब्बतियों का कहना है कि तिब्बत कई सदियों तक एक स्वतंत्र देश रहा था.
कब चीन ने तिब्बत पर किया कब्जा?
1950 में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत में सैन्य कार्रवाई की और पूर्वी तिब्बत पर नियंत्रण स्थापित किया. इसके बाद 1951 में तिब्बत के साथ 17 सूत्री समझौता हुआ. इसके तहत तिब्बत को चीन का हिस्सा माना गया. दलाई लामा और तिब्बती पक्ष इस समझौते को दबाव में हुआ समझौता मानते हैं.
1959 में विद्रोह और दलाई लामा का भारत आना...
1959 में चीन के खिलाफ तिब्बत में विद्रोह हुआ, लेकिन यह सफल नहीं हुआ. इसके बाद 14वें दलाई लामा तिब्बत छोड़कर भारत आ गए और यहां शरण ली. आज चीन तिब्बत को अपने स्वायत्तशासी क्षेत्र यानी Tibet Autonomous Region (TAR) के रूप में देखता है. वहीं तिब्बत के निर्वासित लोग और कई संगठन तिब्बती संस्कृति, अधिकारों और स्वतंत्रता के सवाल को लगातार उठाते रहे हैं.
चीन पर दमन के क्या लगते हैं आरोप?
चीन की सरकार पर तिब्बत में मानवाधिकारों के उल्लंघन, तिब्बती संस्कृति को कमजोर करने और लोगों पर दमन करने के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं. मानवाधिकार संगठनों और तिब्बत की निर्वासित सरकार की ओर से कई तरह के आरोप लगाए जाते रहे हैं. इनमें सांस्कृतिक पहचान, भाषा, धार्मिक स्वतंत्रता और लोगों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे शामिल हैं.
‘सांस्कृतिक नरसंहार’ का आरोप..
दलाई लामा और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि चीन की “सिनिसाइजेशन” यानी चीनीकरण की नीति के जरिए तिब्बती संस्कृति और पहचान को धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है. उनका आरोप है कि तिब्बती भाषा, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान पर इसका असर पड़ रहा है.
तिब्बत में बड़े पैमाने पर बोर्डिंग स्कूल बनाए जाने को लेकर भी विवाद है. आरोप है कि करीब 10 लाख तिब्बती बच्चों को उनके परिवारों से अलग कर इन स्कूलों में रखा जाता है. वहां उन्हें तिब्बती भाषा के बजाय मंदारिन यानी चीनी भाषा में शिक्षा देने और कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुरूप ढालने का दबाव रहता है.
तिब्बती भाषा को लेकर भी विवाद?
चीन के नए कानूनों, जिनमें “एथनिक यूनिटी लॉ” भी शामिल है, को लेकर आरोप लगाए गए हैं कि इनके जरिए तिब्बती भाषा की पढ़ाई और इस्तेमाल को सीमित किया जा रहा है. आलोचकों का कहना है कि इससे तिब्बती भाषा और सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो रही है.
तिब्बत के अंदर दलाई लामा की तस्वीर रखने, उनकी पूजा करने या उनके लिए सार्वजनिक प्रार्थना करने पर प्रतिबंध होने के आरोप भी लगाए जाते हैं. आरोप है कि ऐसा करने वाले लोगों को सरकार की ओर से कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है और उन्हें देशद्रोह जैसे आरोपों में जेल भेजा जाता है.
मठों पर सरकार का कंट्रोल
तिब्बत के बौद्ध मठों और वहां रहने वाले भिक्षुओं की गतिविधियों पर भी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के कड़े नियंत्रण के आरोप लगते रहे हैं. आरोप है कि मठों की संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाया गया और भिक्षुओं को कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े पाठ पढ़ाए जाते हैं.
तिब्बत को ‘खुली जेल’ कहने के पीछे क्या कहानी?
अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों और मानवाधिकार समूहों की कुछ रिपोर्टों में तिब्बत को कड़े निगरानी तंत्र वाला क्षेत्र बताया गया है. आरोप है कि वहां स्थानीय लोगों की गतिविधियों पर हाई-टेक निगरानी रखी जाती है और सरकार की आलोचना करने वालों पर नजर रखी जाती है. फोन, सोशल मीडिया, ईमेल और कॉल की निगरानी किए जाने के आरोप भी लगाए गए हैं.
इसके अलावा, तिब्बत के हालात की जानकारी बाहर पहुंचाने वाले पत्रकारों, लेखकों और कलाकारों को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर गिरफ्तार किए जाने के आरोप भी सामने आते रहे हैं.
क्या चीन करा रहा जबरन विस्थापन?
विकास परियोजनाओं और खनन जैसी गतिविधियों को लेकर भी तिब्बती समुदायों के विस्थापन के आरोप लगाए गए हैं. डेर्गे क्षेत्र में बांध परियोजनाओं जैसे मामलों का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया है कि लंबे समय से वहां रह रहे तिब्बती समुदायों और भिक्षुओं को उनकी सहमति के बिना अपने घरों और इलाकों से हटाया गया.
विरोध करने वालों पर कार्रवाई के आरोप?
तिब्बत की आज़ादी, मानवाधिकारों या तिब्बती संस्कृति की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों की मनमानी गिरफ्तारी के भी आरोप लगाए जाते रहे हैं. कुछ रिपोर्टों में जेलों में कैदियों के साथ कथित यातना, लोगों के गायब होने और बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित किए जाने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं. महिलाओं की जबरन नसबंदी जैसे गंभीर आरोप भी सामने आते रहे हैं.
चीन इन आरोपों पर क्या कहता है?
चीन सरकार इन सभी आरोपों को खारिज करती है. चीनी प्रशासन का कहना है कि उसके शासन में तिब्बत का तेजी से आधुनिकीकरण हुआ है. चीन का दावा है कि तिब्बत में गरीबी कम हुई है, सड़क और रेलवे जैसे बुनियादी ढांचे का विकास हुआ है और लोगों के जीवन स्तर में सुधार हुआ है.