कोलकाता की दुर्गा पूजा इस बार सिर्फ आस्था, संस्कृति और उत्सव का सवाल नहीं रह गई है. बंगाल की सियासत बदलने के साथ पूजा के स्वरूप और परंपराओं को लेकर भी नई बहस सामने है. आरएसएस, वीएचपी और दूसरे हिंदू संगठन पारंपरिक पूजा पद्धति और देवी की प्रतिमा की धार्मिक मर्यादा पर जोर दे रहे हैं, जबकि कलाकार और पूजा आयोजकों का एक वर्ग इसे बंगाल की पुरानी कलात्मक आजादी और सांस्कृतिक विविधता से जोड़कर देख रहा है. यानी कोलकाता की दुर्गा पूजा में इस बार सिर्फ पंडालों की सजावट और थीम नहीं बदली है, बल्कि उत्सव के स्वरूप को लेकर भी नई बहस छिड़ी हुई है.

2026 में कोलकाता की दुर्गा पूजा में हुए बदलावों से जुड़ी जानकारी पश्चिम बंगाल सरकार की गाइडलाइन, India Today, The Indian Express और Telegraph India की रिपोर्टों के मुताबिक बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद यह बहस और तेज हुई है. सरकार ने पूजा को लेकर कई नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, वहीं कलाकार और पूजा आयोजक इसे बंगाल की लंबे समय से चली आ रही सांस्कृतिक विविधता के नजरिए से देख रहे हैं.

महालया से शुरू होगा बदलाव का नया दौर

2026 में महालया 10 अक्टूबर को है. इसी दिन से देवी पक्ष की शुरुआत होगी और शहर में दुर्गा पूजा का माहौल तेज हो जाएगा. मुख्य पूजा 16 अक्टूबर की महाषष्ठी से शुरू होगी. महाअष्टमी 19 अक्टूबर, महानवमी 20 अक्टूबर और विजयादशमी 21 अक्टूबर को होगी. इस बार महाषष्ठी के बाद सप्तमी दो दिन पड़ने के कारण पूजा का उत्सव छह दिनों तक चलेगा.

लेकिन पूजा की शुरुआत से पहले ही सरकारी स्तर पर बड़ा बदलाव दिखाई देने लगा है. पूजा समितियों को महालया यानी 10 अक्टूबर से पहले पंडालों का उद्घाटन नहीं करने का निर्देश दिया गया है. इससे उन बड़े पंडालों की परंपरा पर असर पड़ेगा, जिन्हें पहले महालया से पहले ही दर्शकों के लिए खोल दिया जाता था.

 

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रेड रोड से ईडन गार्डन्स तक बदला सरकारी उत्सव

इस साल सबसे बड़ा बदलाव रेड रोड के दुर्गा पूजा कार्निवल को लेकर है. पिछली सरकार के दौर में 2017 से शुरू हुआ यह आयोजन विजयादशमी के बाद होता था, जिसमें चुनिंदा पूजा समितियों की प्रतिमाओं को शामिल किया जाता था. 2026 में सरकार ने इसे नहीं करने का फैसला लिया है.

इसके बदले महालया के दिन कोलकाता के ईडन गार्डन्स में बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. कार्यक्रम में ढाक, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, ड्रोन शो और आतिशबाजी के साथ पूजा के मौसम की शुरुआत को बड़े सार्वजनिक आयोजन के रूप में पेश करने की तैयारी है.

यानी बदलाव सिर्फ एक कार्यक्रम के स्थान का नहीं है. पहले जहां बड़ा सरकारी आयोजन पूजा खत्म होने के बाद रेड रोड पर होता था, इस बार उत्सव की शुरुआत में ही ईडन गार्डन्स को केंद्र में रखा गया है.

अष्टमी पर ड्राई डे और DJ पर रोक

पूजा के तौर-तरीकों में भी इस बार कुछ स्पष्ट बदलाव किए गए हैं. 19 अक्टूबर यानी महाअष्टमी को पूरे पश्चिम बंगाल में शराब की बिक्री बंद रहेगी. बार और शराब की दुकानें भी बंद रहेंगी. यह फैसला पूजा के दौरान शराब की बिक्री और सेवन को लेकर अब तक की व्यवस्था से अलग है.

इसके साथ ही पूजा पंडालों और विसर्जन जुलूसों में DJ बजाने पर रोक रहेगी. सरकार ने पारंपरिक ढाक जैसे वाद्यों की अनुमति रखी है. आयोजकों से सड़कों और राष्ट्रीय राजमार्गों को अनावश्यक रूप से बाधित नहीं करने को भी कहा गया है. इन फैसलों के पीछे सरकार ने पूजा की पारंपरिक प्रकृति, अनुशासन और सार्वजनिक व्यवस्था को प्रमुख आधार बनाया है.

 

क्या थीम पूजा पर भी लगाम लगेगी?

यही इस बार की सबसे बड़ी सांस्कृतिक बहस है. सरकार ने थीम आधारित पूजा पर प्रतिबंध नहीं लगाया है. लेकिन पूजा समितियों से कहा गया है कि पंडाल, प्रतिमा और थीम ऐसे न हों जिन्हें धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला माना जाए या सनातन परंपराओं को कमजोर करने वाला समझा जाए.

यहीं से परंपरा और प्रयोग का सवाल सामने आता है. बंगाल में थीम पूजा कोई नई चीज नहीं है. पिछले कई दशकों में कलाकारों ने पंडालों को कला की प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल किया है. सामाजिक मुद्दों से लेकर इतिहास, लोककला, राजनीति और समकालीन घटनाओं तक को पूजा की थीम बनाया गया है.

इसलिए कलाकारों का एक वर्ग मानता है कि प्रयोग को पूजा से अलग करना मुश्किल है.

 

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कलाकारों के लिए प्रयोग क्यों जरूरी है?

कलाकार सनातन दिंदा का 1998 का उदाहरण अक्सर इस बहस में सामने आता है. खाड़ी युद्ध के बाद उन्होंने ऐसी दुर्गा प्रतिमा बनाई थी, जिसमें देवी के हाथों में पारंपरिक हथियार नहीं थे. गणेश उनकी गोद में थे और महिषासुर को क्षमा मांगते हुए दिखाया गया था. इसका उद्देश्य युद्ध और हिंसा के बीच शांति का संदेश देना था.

दिंदा के मुताबिक देवी को अलग रूप में देखने की कल्पना अपने आप में धार्मिक भावनाओं का अपमान नहीं है. उनके लिए प्रतिमा एक कलाकृति भी है, जिसमें कलाकार अपने समय और समाज की कहानी कह सकता है.

बंगाल की पूजा का इतिहास भी बताता है कि प्रतिमाओं का स्वरूप हमेशा एक जैसा नहीं रहा. पारंपरिक एकचाला शैली से अलग होकर कलाकारों ने समय के साथ देवी और उनके परिवार के स्वरूप में बदलाव किए. 1990 के दशक में थीम पूजा ने इस बदलाव को और गति दी.

फिर धार्मिक संगठनों की आपत्ति क्यों?

दूसरी तरफ आरएसएस और वीएचपी से जुड़े लोगों का तर्क है कि दुर्गा की प्रतिमा सिर्फ कला का नमूना नहीं है. वह भक्तों के लिए देवी का स्वरूप है और उसकी धार्मिक मर्यादा का महत्व है.

वीएचपी ने इस साल पूजा समितियों से पारंपरिक पूजा पद्धति अपनाने और पंडालों के आसपास मांसाहारी भोजन की बिक्री या सेवन से बचने की अपील की है. संगठन की ओर से पूजा की शुरुआत, प्रतिमा के स्वरूप, थीम और विसर्जन जैसे मुद्दों पर भी सुझाव दिए गए हैं.

यानी विवाद का केंद्र यह है कि पूजा में कलात्मक स्वतंत्रता की सीमा कहां तक हो और धार्मिक परंपरा की मर्यादा कहां से शुरू हो.

क्या दुर्गा पूजा हमेशा सिर्फ धार्मिक रही है?

बंगाल का इतिहास इस सवाल का जवाब थोड़ा अलग तरीके से देता है. बंगाल की दुर्गा पूजा लंबे समय से धर्म के साथ सामाजिक जीवन का हिस्सा रही है. बड़े जमींदारों की पूजा में भव्य आयोजन, संगीत, भोजन और सामाजिक मेलजोल शामिल रहा. बाद में सार्वजनिक पूजा के विस्तार के साथ यह आम लोगों के लिए सामूहिक उत्सव बनी.

20वीं सदी में सार्वजनिक दुर्गा पूजा सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता से भी जुड़ी. अलग-अलग पूजा समितियों ने स्थानीय समाज को जोड़ने में भूमिका निभाई. समय के साथ पंडाल और प्रतिमा सामाजिक संदेश देने का माध्यम भी बने.

इसलिए यह कहना आसान नहीं है कि पूजा की कोई एक स्थिर पहचान रही है. इसमें धार्मिक आस्था भी रही, कला भी, सामाजिक जीवन भी और समय-समय पर राजनीतिक संदेश भी.

इस बार असली बदलाव कहां दिखाई देगा?

इस साल बदलाव कई स्तरों पर दिखाई देगा. सरकारी स्तर पर रेड रोड कार्निवल की जगह ईडन गार्डन्स का महालया कार्यक्रम आया है. महाअष्टमी पर ड्राई डे रहेगा. DJ पर रोक होगी. महालया से पहले पंडाल उद्घाटन नहीं होंगे. वहीं थीम पूजा जारी रहेगी, लेकिन धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखने की शर्त के साथ. छोटी पूजा समितियों के लिए एक लाख रुपये तक की सहायता जारी रखने की भी घोषणा की गई है.

दूसरी तरफ जमीन पर कलात्मक प्रयोग जारी हैं. दक्षिण कोलकाता के पाटुली में इस साल जमीन के करीब आठ फीट नीचे बनाया गया पंडाल दर्शकों को एक अलग अनुभव दे रहा है. वहीं सॉल्ट लेक के EC ब्लॉक में महाभारत आधारित ‘अक्षौहिणी’ थीम तैयार की गई है. यानी नियमों के बीच प्रयोग खत्म नहीं हुआ है.

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ममता के दौर में दुर्गा पूजा का फोकस क्या था?

ममता बनर्जी के दौर में दुर्गा पूजा को बंगाल की कला, संस्कृति और पर्यटन की पहचान के तौर पर बड़े स्तर पर पेश किया गया. 2017 में रेड रोड पर दुर्गा पूजा कार्निवल की शुरुआत हुई, जो पूजा के बाद होने वाला प्रमुख सरकारी आयोजन बन गया. 2021 में कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में जगह मिलने के बाद इसकी वैश्विक पहचान और मजबूत हुई. इस दौर में थीम पंडाल, कलात्मक प्रयोग और बड़े सार्वजनिक आयोजनों को खास जगह मिली.

शुभेंदु के दौर में क्या बदला?

2026 में सरकार ने पूजा के धार्मिक और पारंपरिक पक्ष पर ज्यादा जोर दिया है. रेड रोड कार्निवल की जगह महालया पर ईडन गार्डन्स में बड़ा कार्यक्रम रखा गया है. महाअष्टमी पर शराब की बिक्री बंद रहेगी, पूजा और विसर्जन में DJ पर रोक होगी और महालया से पहले पंडालों के उद्घाटन पर भी रोक रहेगी. थीम पूजा जारी रहेगी, लेकिन धार्मिक भावनाओं और परंपराओं का ध्यान रखने की हिदायत दी गई है. यानी बदलाव मुख्य रूप से सरकारी आयोजन के स्वरूप और पूजा में अनुशासन पर जोर को लेकर है.

तो बंगाल की पूजा किस दिशा में बढ़ रही है?

2026 की कोलकाता दुर्गा पूजा को सिर्फ परंपरा या सिर्फ आधुनिकता के खांचे में रखना मुश्किल है. एक तरफ सरकार और धार्मिक संगठन पूजा की पारंपरिक मर्यादा को ज्यादा स्पष्ट करना चाहते हैं. दूसरी तरफ कलाकारों के लिए पूजा अब भी क्रिएटिविटी और सोशल एक्सप्रेसन का बड़ा मंच है.

शायद इसी टकराव में इस साल की पूजा की सबसे बड़ी कहानी छिपी है. देवी की आराधना वही है, लेकिन उसे मनाने और दिखाने का तरीका बदलने को लेकर बहस तेज है. रेड रोड से ईडन गार्डन्स तक सरकारी आयोजन का रास्ता बदला है, पंडालों के उद्घाटन की तारीख बदली है, DJ और शराब को लेकर नियम बदले हैं, लेकिन कलाकारों की कल्पना अभी भी नए रूप तलाश रही है.

इसलिए कोलकाता की दुर्गा पूजा में इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पंडाल कैसा होगा या प्रतिमा कैसी दिखेगी. असली सवाल यह है कि बंगाल अपनी सबसे बड़ी सांस्कृतिक पहचान में परंपरा और प्रयोग के बीच संतुलन कैसे बनाएगा. यही 2026 की दुर्गा पूजा को बाकी वर्षों से अलग बनाता है.