‘वेलफेयर स्टेट’ से ‘डिजिटल वेलफेयर’ तक: कैसे बदलती रही भारत सरकार की भूमिका और पहचान?

आजादी के बाद भारत ने खुद को वेलफेयर स्टेट के रूप में गढ़ा, लेकिन आर्थिक संकट और वैश्वीकरण ने सरकार की भूमिका बदल दी. अब डिजिटल तकनीक के जरिए भारत तेजी से डिजिटल वेलफेयर स्टेट की ओर बढ़ रहा है.

By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 14 March 2026 9:00 PM IST

भारत की शासन व्यवस्था हमेशा स्थिर नहीं रही, बल्कि समय और परिस्थितियों के साथ उसका चरित्र बदलता रहा है. आजादी के बाद देश ने खुद को एक कल्याणकारी राज्य (वेलफेयर स्टेट) के रूप में गढ़ा, जहां सरकार का लक्ष्य था गरीबों का सहारा बनना और समाज के कमजोर वर्गों को सुरक्षा देना. 1990 के दशक में आर्थिक संकट और वैश्वीकरण की लहर ने सरकार की भूमिका को बदल दिया और वह धीरे-धीरे सेवाएं उपलब्ध कराने वाली “सर्विस प्रोवाइडर स्टेट” बन गई. अब 21वीं सदी के तीसरे दशक में, डिजिटल तकनीक के विस्तार के साथ भारत एक नए मॉडल की ओर बढ़ता दिख रहा है, डिजिटल वेलफेयर स्टेट.

आधार, जनधन खाते, मोबाइल कनेक्टिविटी और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर जैसी व्यवस्थाओं ने सरकार और नागरिक के रिश्ते को पहले से कहीं ज्यादा सीधा और पारदर्शी बना दिया है. सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि अलग-अलग दौर में भारत सरकार की पहचान बदलती गई? किन आर्थिक, राजनीतिक और तकनीकी कारकों ने नीतिगत बदलावों को जन्म दिया? और क्या सचमुच भारत अब उस दौर में प्रवेश कर चुका है जहां डिजिटल तकनीक के जरिए कल्याणकारी राज्य की नई परिभाषा लिखी जा रही है. यही पड़ताल इस स्टेट मिरर स्पेशल में.

दरअसल, भारत की आजादी के बाद से आज तक सरकार की भूमिका लगातार बदलती रही है. कभी सरकार का लक्ष्य गरीबी हटाना और सामाजिक सुरक्षा देना था, फिर वह सेवाएं उपलब्ध कराने वाली “सर्विस प्रोवाइडर स्टेट” बन गई, और अब तेजी से “डिजिटल वेलफेयर स्टेट” की दिशा में बढ़ती दिखाई देती है.

यह बदलाव अचानक नहीं हुआ. हर दौर में अर्थव्यवस्था, तकनीक, वैश्विक परिस्थितियों और समाज की जरूरतों ने सरकार को अपनी भूमिका बदलने पर मजबूर किया. यही कारण है कि आज की सरकार न सिर्फ योजनाएं बनाती है बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए सीधे नागरिकों तक पहुंचने की कोशिश करती है.

लेकिन इस बात को बेहतर तरीके से यह समझना जरूरी है कि आखिर वेलफेयर स्टेट, सर्विस प्रोवाइडर स्टेट और डिजिटल वेलफेयर स्टेट क्या हैं, और किन ऐतिहासिक कारणों ने भारत को इन तीन चरणों से गुजरने पर मजबूर किया.

1. आजादी के बाद: भारत क्यों बना “वेलफेयर स्टेट”?

1947 में आजादी के समय भारत बेहद गरीब, विभाजित और संसाधनों की कमी से जूझ रहा था. औद्योगिक ढांचा कमजोर था और बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रही थी. इसी पृष्ठभूमि में संविधान निर्माताओं ने भारत को “वेलफेयर स्टेट” यानी कल्याणकारी राज्य बनाने का लक्ष्य रखा. यानी ऐसा राज्य जिसमें आम नागरिक का कल्याण सरकार की शीर्ष प्रायोरिटी हो.

वेलफेयर स्टेट क्या होता है?

वेलफेयर स्टेट वह व्यवस्था है जिसमें सरकार नागरिकों के शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाती है. इस मॉडल में सरकार का लक्ष्य होता है, 'गरीबी कम करना, शिक्षा और स्वास्थ्य का विस्तार, सामाजिक असमानता कम करना, और कमजोर वर्गों को सुरक्षा देना. यही वजह है कि नेहरू ने मिश्रित अर्थव्यवस्था की नींव रखी. यानी न तो पूरी तरह से पूंजीपतियों की हितैषी सरकार न ही आंख मूंद सब कुछ गरीबों पर न्यौछावर करने वाली सरकार.

“वेलफेयर स्टेट” दौर की प्रमुख विशेषताएं

स्वतंत्रता के बाद सरकार ने योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था को अपनाया. इसके तहत कुछ बड़े कदम उठाए गए. इनमें पंचवर्षीय योजनाएं,

पब्लिक सेक्टर इंडस्ट्री पर जोर, सरकारी स्कूल और अस्पताल व खाद्यान्न सुरक्षा (फूड सिक्योरिटी) पर जोर. इस दौर में सरकार को “माई-बाप सरकार” कहा जाता था, क्योंकि वह नागरिकों की लगभग हर जरूरत पूरी करने की कोशिश करती थी.

किन नेताओं की सोच से बना यह मॉडल?

इस नीति की वैचारिक जड़ें मुख्य रूप से Jawaharlal Nehru की समाजवादी सोच में थीं. उनका मानना था कि अगर राज्य मजबूत भूमिका नहीं निभाएगा तो सामाजिक असमानता बढ़ेगी. इस सोच को आगे बढ़ाते हुए इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ और बैकों का राष्ट्रीयकरण और प्रिवीपर्स समाप्त करने पर जोर दिया था. इंदिरा के दौर में गरीबों को दुधारू पशुओं के एवज में भी लोन दिए गए.

2. 1991 का मोड़: भारत कैसे बना “सर्विस प्रोवाइडर स्टेट”

1991 में भारत गंभीर आर्थिक संकट में फंस गया. विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका था और देश को IMF से कर्ज लेना पड़ा. गोल्ड गिरवी रखने पड़े थे. इस दौर में गठबंधन सरकार की शुरुआत हुई और कांग्रेस सत्ता में वापस लौटी. नरसिम्हा राव देश के पीएम बने. आरबीआई के गवर्नर रहे मनमोहन सिंह देश के वित्त बने. इसी दौर में देश में निजी, वैश्वीकरण और उदारीकरण र सरकार ने जोर दिया. ​जिस मोदी सरकार को राहुल गांधी पूंजीपति मित्रों की सरकार कहते हैं, उसकी शुरुआत इसी दौर में शुरू हो गई थी. इन बदलावों का श्रेय पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार को जाता है.

सर्विस प्रोवाइडर स्टेट क्या होता है?

इस मॉडल में सरकार खुद हर काम नहीं करती बल्कि निजी क्षेत्र को अवसर देती है और नागरिकों को सेवाएं उपलब्ध कराने की भूमिका निभाती है.

सरकार का फोकस क्यो बदल गया?

उद्योग चलाने से हटकर नियमन और सेवा उपलब्ध कराना, निजी कंपनियों को प्रोत्साहन और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना.

क्यों जरूरी हुआ यह बदलाव?

  • 1991 का भुगतान संतुलन संकट सरकार को मजबूर कर रहा था कि वह अपनी आर्थिक नीतियां बदले.
  • दुनिया तेजी से वैश्विक अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही थी.
  • सरकारी उपक्रम लगातार नुकसान में थे. इस दौर में हुए बड़े बदलाव हुए.
  • लाइसेंस राज खत्म हुआ. विदेशी निवेश को अनुमति मिली, निजी क्षेत्र का विस्तार हुआ और पहली बार देश में सेवा क्षेत्र ने गति पकड़ी जो आज तक जारी.
  • यही वह दौर था जब IT सेक्टर और सेवा आधारित अर्थव्यवस्था ने भारत की पहचान बदलनी शुरू की.

3. तीसरा चरण: डिजिटल वेलफेयर स्टेट का उदय

21वीं सदी के दूसरे दशक में भारत एक नए दौर में प्रवेश करता दिखाई देता है, जिसे आप 'डिजिटल वेलफेयर स्टेट' कह सकते हैं. यह बदलाव खासतौर पर नरेंद्र मोदी के शासनकाल में तेजी से दिखता है.

डिजिटल वेलफेयर स्टेट क्या होता है?

  • डिजिटल वेलफेयर स्टेट, वह व्यवस्था है, जिसमें सरकार डिजिटल तकनीक के जरिए योजनाओं को सीधे नागरिकों तक पहुंचाती है.
  • इसका मुख्य उद्देश्य है, भ्रष्टाचार कम करना, बिचौलियों को हटाना, पारदर्शिता बढ़ाना और सरकारी सेवाओं को आसान बनाना शामिल है.

  • आम लोगों की भाषा में कहें तो “डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए कल्याणकारी योजनाओं का संचालन” ही डिजिटल वेलफेयर स्टेट है.                                                                                                                                                    

पिछले एक दशक दौरान डिजिटल वेलफेयर के जरिए कई योजनाओं पर मोदी सरकार ने सख्त आलोचना के बावजूद अमल किया. इनमें :

1. आधार : Unique Identification Authority of India द्वारा जारी आधार ने नागरिकों की डिजिटल पहचान बनाई.

2. जनधन खाते : Pradhan Mantri Jan Dhan Yojana के तहत करोड़ों लोगों के बैंक खाते खुले.

3. मोबाइल कनेक्टिविटी : स्मार्टफोन और इंटरनेट ने डिजिटल सेवाओं की पहुंच बढ़ाई. इन तीनों को मिलाकर अक्सर “JAM ट्रिनिटी” (Jan Dhan–Aadhaar–Mobile) कहा जाता है.

4 डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर : सरकार की Direct Benefit Transfer व्यवस्था के जरिए सब्सिडी सीधे बैंक खातों में भेजी जाती है.

5. गैस सब्सिडी : प्रधान मंत्री उज्जवला योजना के लाभार्थियों को सीधे सब्सिडी मिलती है.

6. डिजिटल भुगतान : Unified Payments Interface ने डिजिटल भुगतान को आम बना दिया.

7. स्वास्थ्य सुरक्षा : Ayushman Bharat के तहत डिजिटल हेल्थ कार्ड बनाए गए.

8. किसान सहायता : Pradhan Mantri Kisan Samman Nidhi के तहत किसानों को सीधे बैंक खातों में पैसे भेजे जाते हैं.

डिजिटल बदलाव से क्या फायदे हुए?

डिजिटल वेलफेयर मॉडल के कई महत्वपूर्ण लाभ सामने आए. माना जाता है कि पारदर्शिता बढ़ी और बिचौलियों की भूमिका कमी आई, लेकिन एक तबका है, जो इससे सहमत नहीं है. इन योजनाओं की वजह से लाभ सीधे लाभार्थी तक पहुंचने लगे. प्रशासनिक निर्णयों में तेजी आई. सरकारी योजनाओं का कार्यान्वयन तेज हुआ. सरकार अब डेटा एनालिटिक्स के आधार पर योजनाएं बना सकती है.

फिर भी, चुनौतियां अब भी कम नहीं?

हालांकि, डिजिटल वेलफेयर मॉडल के साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं. 1.4 अरब आबादी दो हिस्सों में बंट गई. इसे डिजिटल डिवाइड कहा गया. ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता अभी भी कम है. नागरिकों के डेटा या प्राइवेसी की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन गया है. अगर सिस्टम फेल हो जाए तो सेवाएं बाधित हो सकती हैं.

क्या भारत सच में डिजिटल वेलफेयर स्टेट बन चुका है?

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत “डिजिटल वेलफेयर स्टेट की ओर बढ़ रहा है. सच यह है कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से बढ़ रहा है. सरकारी सेवाएं ऑनलाइन हो रही हैं. डिजिटल भुगतान दुनिया में सबसे तेज बढ़ रहे हैं, लेकिन अभी भी डिजिटल समावेशन एक बड़ी चुनौती है.

क्या भविष्य की सरकार “डेटा ड्रिवन गवर्नेंस” की होगी?

आने वाले समय में भारत की शासन व्यवस्था डेटा आधारित प्रशासन की ओर बढ़ सकती है. इस लिहाज से संभावित बदलाव कई सामने आने के संकेत हैं. इनमें AI आधारित सरकारी सेवाएं, डिजिटल हेल्थ इकोसिस्टम, स्मार्ट कृषि प्लेटफॉर्म, डिजिटल सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क व अन्य.

बदलती जरूरतों के साथ बदलती सरकार!

भारत की शासन व्यवस्था का इतिहास यह दिखाता है कि सरकार की भूमिका स्थिर नहीं होती, बल्कि समय के साथ बदलती रहती है. आजादी के बाद वेलफेयर स्टेट, 1990 के बाद सर्विस प्रोवाइडर स्टेट और अब डिजिटल वेलफेयर स्टेट इसकी पहचान है. संभव है कि आने वाले दशक में भारत की पहचान “डिजिटल गवर्नेंस मॉडल” के रूप में पूरी दुनिया में एक उदाहरण बन जाए.

वेलफेयर से डिजिटल इंडिया ही क्यों? लॉ प्रोफेसर ने दिया ये जवाब

मेरठ यूनिवर्सिटी लॉ डिपार्टमेंट के प्रोफेसर डॉ. विवेक त्यागी यह पूछने पर कि आप ‘वेलफेयर स्टेट’ से ‘डिजिटल वेलफेयर’ तक के दौर को किस रूप में देखते हैं. उन्होंने कहा, दौर कोई भी क्यों न हो, हर दौर में सरकार मकसद लोगों का वेलफेयर करना ही रहा है. देश के संविधान को ही आप ले जीजिए. इसे एक या दो शब्द में कहें तो वो 'लोक कल्याणकारी दस्तावेज' है.

उन्होंने आगे कहा कि डॉ. भीम राव अंबेडकर ने भी संविधान को सोशल डॉक्यूमेंट कहा था. चूंकि, संविधान सभा द्वारा निर्मित कानून देश में लागू है. पूरी आबादी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं से संचालित है. इसलिए, सत्ता में किसी भी भी सरकार क्यों न हो उसके शासन का मूल आधार वेलफेयर ही होगा.

लॉ के प्रोफेसर डॉ. विवेक त्यागी ने कहा कि जहां त​क बात देश की आजादी के बाद से सरकार के लोक कल्याणकारी होने की बात है तो नेहरू ने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए समाजवादी विचारों को तवज्जो दी थी. इसलिए, बड़े बड़े उद्योग स्थापित किए गए. स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, बांध बनवाए गए. इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया. बीमा क्षेत्र को बढ़ाने के लिए एलआईसी और जीआईसी को बढ़ावा मिला. गरीबी हटाओ का नारा दिया गया. उसके बाद निजीकरण, उदारीकरण और विश्व एक गांव को कॉन्सेप्ट को आगे बढ़ाया गया.

अब जब मोदी सरकार है सरकार डिजिटल वेलफेयर वाली हो गई है. ऐसा होना कोई अजूबा नहीं है. तकनीकी का दौर है. तकनीकी की वजह से विश्व एक गांव में तब्दील हो गया है. इसलिए, कोई सरकार क्यों न हो, वो चाहे या न चाहे, डिजिटालाइजेशन तो होना ही था. डिजिटल इंडिया इस लिहाज से एक इनहरेंट पार्ट है. इसी बात को कानूनी पहले के नजरिए से देखे तो कई जगह पर कमियां डाटा प्रोटेक्शन और लोगों की निजता यानी प्राइवेसी को लेकर है. यह एक गंभीर चुनौती है. इसको लेकर भी सरकार सकारात्मक कदम उठा रही है. उसका भी कोई न कोई समाधान निकलेगा.

Similar News