CEC की नियुक्ति में CJI क्यों नहीं? चुनाव आयोग कितना स्वतंत्र, संविधान क्या कहता है?
ज्ञानेश कुमार की CEC नियुक्ति में CJI को हटाने पर सुप्रीम कोर्ट में बहस जारी है. जानिए Article 324, 2023 कानून और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता का पूरा मामला.
भारत में सरकार बनाने का फैसला जनता अपने वोट से करती है, लेकिन उस वोट को निष्पक्ष चुनाव में बदलने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है. इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त यानी CEC की नियुक्ति केवल सरकारी नियुक्ति नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था से जुड़ा सवाल है. अब सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई ने फिर पूछा है कि जिस संस्था को सरकार और विपक्ष, दोनों के चुनावी आचरण पर निगरानी रखनी है, उसके प्रमुख की नियुक्ति करने वाली समिति में सरकार का कितना प्रभाव होना चाहिए? क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी CJI की मौजूदगी चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को मजबूत करती है?
30 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली समिति से CJI को हटाने की जरूरत क्यों पड़ी. अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि किसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता केवल वास्तविक नहीं, बल्कि जनता को दिखाई भी देनी चाहिए. हालांकि, अदालत ने अभी यह फैसला नहीं दिया है कि CJI को समिति में वापस लाया जाए. मामले को बड़ी पीठ के पास भेजे जाने के सवाल पर आदेश अभी सुरक्षित है.
चुनाव आयोग इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मतदाता सूची तैयार करने और संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के संचालन की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण चुनाव आयोग को दिया गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त इस संस्था का प्रमुख होता है. इसलिए उसकी नियुक्ति की प्रक्रिया जितनी निष्पक्ष होगी, चुनाव आयोग पर जनता का भरोसा भी उतना मजबूत होगा.
अनुच्छेद 324(5) मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी सुरक्षा देता है. वहीं अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश जरूरी होती है. यानी नियुक्ति के साथ पद की सुरक्षा भी चुनाव आयोग की स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
क्या संविधान में CJI को समिति में रखना जरूरी है?
ऐसा करना जरूरी नहीं है. अनुच्छेद 324(2) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, लेकिन यह नियुक्ति संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन हो सकती है. यानी संविधान ने संसद को नियुक्ति प्रक्रिया तय करने के लिए कानून बनाने की जगह दी है.
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि संविधान ने हमेशा के लिए CJI को नियुक्ति समिति का सदस्य बनाया है. CJI को समिति में शामिल करने की व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में तब तक के लिए बनाई थी, जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बना देती.
2023 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या व्यवस्था दी थी?
यह मामला था Anoop Baranwal बनाम भारत संघ से जुड़ा है. 2 मार्च 2023 को सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए अंतरिम व्यवस्था तय की.
अदालत ने कहा था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश होंगे. यह स्थायी संवैधानिक प्रावधान नहीं था. इसका उद्देश्य संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक नियुक्ति प्रक्रिया में एक स्वतंत्र संवैधानिक आवाज शामिल करना था.
फिर संसद ने क्या बदला?
दिसंबर 2023 में संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 पारित किया. यह कानून 2 फरवरी 2024 से लागू हुआ. इसके तहत नियुक्ति समिति की संरचना बदल गई.
अब समिति में प्रधानमंत्री अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष के नेता सदस्य और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल का एक मंत्री तीसरा सदस्य होता है. यानी CJI को समिति से बाहर कर दिया गया और उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया.
विवाद की असली वजह क्या?
तीन सदस्यों वाली समिति में प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री सरकार की ओर से होते हैं, जबकि तीसरे सदस्य विपक्ष के नेता हैं. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे सरकार को समिति में प्रभावी बहुमत मिल जाता है.
उनका तर्क है कि चुनाव आयोग को उसी सरकार और सत्ताधारी दल के चुनावी आचरण पर निगरानी रखनी होती है. ऐसे में उसके प्रमुख की नियुक्ति में सरकार का निर्णायक प्रभाव चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा कर सकता है.
अहम सवाल यह है कि जिस संस्था को चुनाव का निष्पक्ष प्रहरी होना है, उसके प्रहरी की नियुक्ति में किसी एक पक्ष का प्रभाव कितना होना चाहिए?
सरकार का तर्क क्या है?
केंद्र सरकार का कहना है कि संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि CJI को मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति समिति का सदस्य होना ही चाहिए. सरकार के अनुसार अनुच्छेद 324(2) संसद को नियुक्ति प्रक्रिया तय करने के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है और संसद ने इसी संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल किया है.
सरकार यह भी कहती है कि किसी व्यक्ति की निष्पक्षता केवल इस आधार पर तय नहीं की जा सकती कि वह प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री है. इसलिए केवल समिति की संरचना के आधार पर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल उठाना उचित नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट की चिंता क्या है?
2026 की सुनवाई में अदालत का ध्यान केवल कानूनी प्रावधानों तक सीमित नहीं रहा. अदालत ने चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और जनता के भरोसे को भी महत्वपूर्ण माना.
मई 2026 की सुनवाई में अदालत ने लंबे समय तक नियुक्ति प्रक्रिया के लिए व्यापक कानून नहीं बनाए जाने को लेकर गंभीर टिप्पणी की थी. 30 जुलाई की सुनवाई में चर्चा इस बात पर केंद्रित रही कि किसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता केवल वास्तविक होनी चाहिए या आम जनता को भी वह निष्पक्ष दिखाई देनी चाहिए. यहीं महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है- संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता केवल होनी नहीं चाहिए, दिखाई भी देनी चाहिए.
क्या CJI को हटाना अपने आप में असंवैधानिक है?
अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. सुप्रीम कोर्ट ने अब तक यह फैसला नहीं दिया है कि CJI को नियुक्ति समिति से हटाना अपने आप असंवैधानिक है. अदालत के सामने बड़ा सवाल यह है कि अनुच्छेद 324(2) के तहत संसद की कानून बनाने की शक्ति की सीमा क्या है.
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं. इसलिए संसद ऐसी नियुक्ति प्रक्रिया नहीं बना सकती, जिससे कार्यपालिका का प्रभाव इतना बढ़ जाए कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हो.
सरकार का जवाब है कि संसद ने अनुच्छेद 324(2) के तहत ही कानून बनाया है और जब तक स्पष्ट संवैधानिक उल्लंघन न हो, अदालत को संसद के बनाए कानून में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.
क्या CJI ही स्वतंत्रता का एकमात्र रास्ता है?
अगर मूल सवाल नियुक्ति समिति में सरकार से अलग और स्वतंत्र संवैधानिक आवाज का है, तो उसके लिए केवल CJI को ही विकल्प मानना जरूरी नहीं है. एक व्यवस्था प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI की हो सकती है, जैसा 2023 में सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम व्यवस्था में था. दूसरी मौजूदा कानून की व्यवस्था है— प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री. तीसरा विकल्प ऐसा हो सकता है, जिसमें प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के साथ कोई वास्तव में स्वतंत्र संवैधानिक पदाधिकारी शामिल हो.
इसलिए विवाद केवल “CJI क्यों नहीं?” तक सीमित नहीं होना चाहिए. बड़ा सवाल है कि नियुक्ति समिति में सरकार से स्वतंत्र निर्णायक आवाज कौन देगा?
क्या EC की स्वतंत्रता सिर्फ नियुक्ति से तय होती है?
नहीं. किसी संस्था की स्वतंत्रता को केवल यह देखकर नहीं परखा जा सकता कि उसके प्रमुख को कौन नियुक्त करता है. इसके पांच प्रमुख आधार हैं—नियुक्ति की प्रक्रिया, कार्यकाल की सुरक्षा, पद से हटाने की प्रक्रिया, वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता तथा निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता.
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संविधान में विशेष सुरक्षा है, लेकिन अन्य चुनाव आयुक्तों की स्थिति अलग है. इसलिए नियुक्ति की स्वतंत्रता के साथ पद की सुरक्षा और संस्थागत अधिकारों पर भी चर्चा जरूरी है.
यानी असली सवाल यह भी है कि चुनाव आयोग राजनीतिक दबाव से कितना सुरक्षित है और अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल कितनी स्वतंत्रता से कर सकता है.
सुप्रीम कोर्ट के सामने अब कौन-कौन से सवाल हैं?
- पहला, क्या अनुच्छेद 324(2) संसद को CEC की नियुक्ति की कोई भी प्रक्रिया बनाने की पूरी स्वतंत्रता देता है?
- दूसरा, क्या स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा चुनाव आयोग की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना से जुड़ी है?
- तीसरा, क्या संसद ऐसी नियुक्ति समिति बना सकती है जिसमें कार्यपालिका का प्रभाव बहुत अधिक हो?
- चौथा, क्या जनता की नजर में निष्पक्षता भी संस्थागत स्वतंत्रता का हिस्सा है?
- 30 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजे जाने के सवाल पर आदेश सुरक्षित रखा. इसलिए, यह कहना गलत होगा कि अदालत ने 2023 के कानून को रद्द कर दिया है या CJI को समिति में वापस लाने का आदेश दे दिया है.
1950 से 2026 तक पूरी कहानी
1950: संविधान लागू हुआ और अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनावों की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण की संवैधानिक जिम्मेदारी मिली.
1991: चुनाव आयोग के सेवा संबंधी मामलों और कामकाज से जुड़े वैधानिक प्रावधान आए.
2015: मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता से जुड़ा मामला अदालत के सामने आया.
2 मार्च 2023: सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI वाली समिति की व्यवस्था दी.
दिसंबर 2023: संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा नया कानून पारित किया.
2 फरवरी 2024: नया कानून लागू हुआ और CJI की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को नियुक्ति समिति में शामिल किया गया.
मई 2026: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर गंभीर टिप्पणियां कीं.
30 जुलाई 2026: अदालत ने CJI को समिति से बाहर रखने, संस्थागत निष्पक्षता और मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने के सवाल पर सुनवाई की तथा आदेश सुरक्षित रखा.
असली मुद्दा CJI नहीं, चुनावी भरोसा है
इस पूरे विवाद को केवल CJI बनाम केंद्रीय मंत्री के रूप में देखना सही नहीं होगा. असली सवाल चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और जनता के भरोसे का है.
सरकार का पक्ष है कि संसद ने अनुच्छेद 324(2) के तहत कानून बनाया है और CJI की मौजूदगी कोई संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है. दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं की चिंता है कि जिस संस्था को चुनाव में सरकार और विपक्ष दोनों के आचरण पर निगरानी रखनी है, उसके प्रमुख की नियुक्ति में सरकार का निर्णायक प्रभाव चुनावी निष्पक्षता की धारणा को कमजोर कर सकता है.
आखिरकार लोकतंत्र में चुनाव आयोग की सबसे बड़ी ताकत केवल उसके संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि जनता का भरोसा है. अगर चुनाव हारने वाला विपक्ष आयोग के फैसलों पर भरोसा नहीं करता और जीतने वाली सरकार भी उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठने से बच नहीं पाती, तो समस्या केवल नियुक्ति समिति की नहीं रह जाती.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट के सामने असली संवैधानिक परीक्षा यह है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र कैसे रहे और उसकी स्वतंत्रता जनता को साफ दिखाई भी दे.
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अगला मुख्य चुनाव आयुक्त कौन होगा. बड़ा सवाल यह है कि अगला चुनाव खत्म होने के बाद हारने वाला पक्ष भी चुनाव आयोग के फैसले पर भरोसा क्यों करेगा? यही भरोसा भारतीय चुनाव व्यवस्था की सबसे बड़ी कसौटी है.