मां सीता के श्राप के कारण इस समाज की महिलाएं रहती हैं 'अर्धनग्न', इन कारणों से 10 साल छोटे पुरुष के साथ करती हैं शादी; पढ़िए अनसुने किस्से

ओडिशा की बोंडा जनजाति की अनोखी परंपराएं, महिलाओं की भूमिका, रहन-सहन और संस्कृति की पूरी कहानी जानें इस एक्सप्लेनर में.

By :  सागर द्विवेदी
Updated On : 12 April 2026 9:08 PM IST

ओडिशा के मलकानगिरी जिले के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों के बीच एक ऐसी दुनिया बसती है, जो आज भी आधुनिकता से काफी हद तक दूर है. यह दुनिया है बोंडा जनजाति की. एक ऐसा समुदाय, जिसकी परंपराएं, रहन-सहन और सामाजिक ढांचा हजारों साल पुराना माना जाता है. यहां की जिंदगी बाहरी दुनिया से बिल्कुल अलग है, जहां हर नियम, हर रिवाज और हर कहानी पीढ़ियों से जस की तस चली आ रही है.  

आज जब पूरी दुनिया तेजी से बदल रही है, तब भी बोंडा जनजाति अपनी सांस्कृतिक पहचान को मजबूती से बचाए हुए है. हालांकि अब सरकारी हस्तक्षेप, शिक्षा और बाहरी संपर्क के चलते धीरे-धीरे बदलाव की आहट यहां भी सुनाई देने लगी है, लेकिन इसके बावजूद इस समुदाय की मूल आत्मा आज भी जीवित है.

बोंडा जनजाति आखिर कौन और ये कहां रहती है?

बोंडा जनजाति भारत के 75 खास रूप से संवेदनशील आदिवासी समूहों (PVTG) में शामिल है. यह समुदाय मुख्य रूप से ओडिशा के मलकानगिरी जिले की बोंडा पहाड़ियों में निवास करता है. इनकी आबादी बेहद सीमित है और अनुमान के मुताबिक आज केवल 9 से 12 हजार के बीच ही बोंडा बचे हैं.

इस जनजाति के दो प्रमुख वर्ग हैं- ऊपरी बोंडा और निचले बोंडा. ऊपरी बोंडा आज भी बाहरी दुनिया से लगभग कटे हुए हैं और अपनी परंपराओं को पूरी तरह निभाते हैं, जबकि निचले बोंडा में कुछ हद तक आधुनिकता का प्रभाव देखा जा सकता है.


बोंडा जनजाति की भाषा और पहचान क्या है?

बोंडा लोग ‘रेमो’ भाषा बोलते हैं, जो ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार से जुड़ी है और गुतोब भाषा के करीब मानी जाती है. यह भाषा उनकी सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है. हालांकि, बदलते समय के साथ यह भाषा विलुप्त होने के खतरे में भी है, क्योंकि नई पीढ़ी ओड़िया और अन्य भाषाओं की ओर बढ़ रही है.

कैसे होता है बोंडा महिलाओं का जीवनयापन?

बोंडा जनजाति का जीवन पूरी तरह प्रकृति पर आधारित है. ये लोग शिफ्टिंग खेती (पोडु या क्लुंडा चास) करते हैं. इसके अलावा पशुपालन, शिकार और जंगल से मिलने वाली मौसमी उपज इनके जीवन का अहम हिस्सा है. यहां के लोग कोंगो, काजू, आम, कटहल, आंवला और बांस जैसी चीजों की खेती भी करते हैं. उनका जीवन सादगी से भरा है, जहां जरूरत के हिसाब से ही संसाधनों का उपयोग किया जाता है.


बोंडा महिलाओं की पहचान इतनी खास क्यों है?

बोंडा महिलाओं की वेशभूषा उन्हें बाकी दुनिया से अलग बनाती है. वे ‘रिंगा’ नाम का छोटा वस्त्र पहनती हैं, जो केवल कमर के नीचे ढकता है. शरीर के ऊपरी हिस्से को वे रंग-बिरंगे मोतियों, कौड़ियों और धातु के भारी गहनों से ढकती हैं. उनके गले में मोटे एल्युमिनियम के छल्ले (खागला), मोतियों की माला (माली) और सिर पर खास हेडबैंड होते हैं. ये गहने सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी माने जाते हैं.

क्या इनके पहनावे के पीछे कोई कहानी भी है?

बोंडा समुदाय में एक पौराणिक मान्यता प्रचलित है. कहा जाता है कि एक बार माता सीता स्नान कर रही थीं और बोंडा समुदाय के लोगों ने उन्हें देखकर हंसी उड़ाई. इससे नाराज होकर सीता ने उन्हें श्राप दिया कि वे हमेशा अधनंगे रहेंगे. बाद में जब लोगों ने माफी मांगी, तो सीता ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा दिया, जिसे आज ‘रिंगा’ के रूप में पहना जाता है.

बोंडा महिलाओं को समाज में कैसे देखा जाता है?

बोंडा समाज में मातृसत्तात्मक व्यवस्था देखने को मिलती है. यहां महिलाएं परिवार और समाज दोनों में मजबूत भूमिका निभाती हैं. वे ही मुख्य श्रमिक और परिवार की जिम्मेदार होती हैं. यहां एक अनोखी परंपरा भी है. महिलाएं अपने से 5 से 10 साल छोटे पुरुषों से शादी करती हैं. माना जाता है कि इससे भविष्य में पति उनकी देखभाल कर सके.

शादी की परंपरा इतनी अलग क्यों है?

बोंडा समाज में शादी एक लंबी और अनोखी प्रक्रिया है. गांव में जब लड़कियां नृत्य करती हैं, तब लड़के उन्हें पसंद करते हैं. इसके बाद लड़के का परिवार लड़की के घर प्रस्ताव लेकर जाता है, लेकिन पहली बार प्रस्ताव ठुकरा दिया जाता है. यह प्रक्रिया करीब डेढ़ साल तक चलती है. अंत में लड़के का परिवार जोर देकर शादी तय करता है. शादी में बारात पुरुष नहीं, बल्कि महिलाएं लेकर जाती हैं.

गांव का सामाजिक ढांचा कैसे चलता है?

बोंडा गांव पूरी तरह स्वायत्त होते हैं. यहां ‘नाइक’ (मुखिया), ‘चल्लान’ (सभा आयोजक) और ‘बरिक’ (संदेशवाहक) जैसे पद होते हैं, जो गांव के फैसले लेते हैं. गांव के बीच एक पेड़ के नीचे ही ‘कोर्ट’ लगती है, जहां सभी विवादों का निपटारा किया जाता है. बोंडा समाज में नियम बेहद कड़े हैं.

  • एक ही गोत्र में शादी करना पाप माना जाता है
  • नियम तोड़ने पर समाज से बाहर कर दिया जाता है
  • जुर्माने के रूप में गाय या पैसे देने पड़ते हैं. हालांकि अब धीरे-धीरे इन नियमों में बदलाव भी देखा जा रहा है.

बोंडा लोगों की जिंदगी करीब से कैसी दिखती है?

सुबह के करीब 10 बजे का समय था. हल्की धूप में एक मिट्टी से लिपा हुआ घर खड़ा था. सुबह के समय गांव की तस्वीर बेहद अलग होती है. मिट्टी से लिपे घर, बाहर झाड़ू लगाती महिलाएं और खेलते बच्चे. सब कुछ एक लय में चलता हुआ दिखाई देता है. 'यह आपको अजीब लग सकता है, लेकिन यह दुश्मनी नहीं, बल्कि परंपरा है.' यहां की हर परंपरा, चाहे वह कितनी भी अलग क्यों न लगे, उनके लिए सामान्य जीवन का हिस्सा है.

बोंडा समुदाय का खानपान कैसा होता है?

बोंडा लोग साधारण लेकिन पोषक भोजन करते हैं.

  • चावल
  • मंडिया (फर्मेंटेड अनाज)
  • बीफ, पोर्क
  • सब्जियां

यहां ‘मंडिया’ खास व्यंजन है, जो हल्का खट्टा स्वाद देता है और रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा है.

त्योहार और परंपराएं कैसी हैं?

बोंडा समुदाय के त्योहार प्रकृति और पूर्वजों से जुड़े होते हैं.

  • ‘पुस’ त्योहार (फसल के बाद)
  • ‘झाटीमारा’ (झगड़े खत्म करने का पर्व)
  • ‘पाथखांडा यात्रा’ (सबसे बड़ा उत्सव)

झाटीमारा में लोग एक-दूसरे को पेड़ की टहनियों से मारते हैं, जब तक कि उनका गुस्सा खत्म न हो जाए. इसके बाद वे गले मिलते हैं और महिलाएं घाव पर हल्दी लगाती हैं.

मृत्यु के बाद क्या परंपराएं निभाई जाती हैं?

बोंडा लोग मृतकों का दाह संस्कार करते हैं. एक या दो महीने बाद पूरे गांव के लिए भोज आयोजित किया जाता है, जिसे ‘एकोस्याह’ कहा जाता है. इसमें चावल और मांस परोसा जाता है.

क्या अब इस जनजाति में बदलाव आ रहा है?

सरकार ने 1977 में बोंडा डेवलपमेंट एजेंसी की शुरुआत की, ताकि इस समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ा जा सके. अब पक्के घर, शिक्षा और रोजगार के अवसर दिए जा रहे हैं. लेकिन इसके साथ ही उनकी भाषा, संस्कृति और परंपराओं पर खतरा भी बढ़ रहा है.

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