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डॉलर vs रियाल.. तेल की जंग में कौन मारेगा बाजी? Retd. Lt Gen संजय कुलकर्णी ने ईरान-इजरायल पर क्या बताया ?

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Retd. Lt Gen Sanjay Kulkarni on iran vs usa latest news | us iran conflict 2026 | middle east war
जीतेंद्र चौहान
By: जीतेंद्र चौहान

Published on: 9 April 2026 4:14 PM

ईरान- इजरायल युद्ध पर सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी ने बताया कि दुनियाभर में तेल सिर्फ ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि वैश्विक ताकत और अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है. अमेरिका लंबे समय से यह चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की खरीद-बिक्री केवल डॉलर में ही हो, ताकि उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहे. इसी वजह से “पेट्रो-डॉलर” सिस्टम आज भी वैश्विक फाइनेंशियल स्ट्रक्चर की रीढ़ माना जाता है. वहीं दूसरी ओर, चीन और ईरान जैसे देश इस व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान कई बार युआन (चीन की मुद्रा) में तेल व्यापार की बात कर चुका है, जो सीधे तौर पर अमेरिका के लिए चिंता का विषय है. चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है और अपनी जरूरत का करीब 60-70% तेल बाहर से मंगाता है. अगर वैश्विक खपत की बात करें तो दुनिया में रोजाना करीब 100 मिलियन बैरल तेल इस्तेमाल होता है. इसमें अमेरिका लगभग 20 मिलियन बैरल, चीन 16 मिलियन बैरल और भारत करीब 6 मिलियन बैरल प्रतिदिन खपत करता है. यानी सिर्फ ये तीन देश मिलकर दुनिया के कुल तेल का लगभग 42% उपयोग करते हैं. अमेरिका जहां अपने तेल भंडार को बचाने के लिए आयात और निर्यात दोनों करता है, वहीं चीन की बढ़ती जरूरतें उसे नए विकल्प तलाशने के लिए मजबूर कर रही हैं. ऐसे में अगर तेल व्यापार डॉलर के बजाय अन्य मुद्राओं में होने लगता है, तो वैश्विक आर्थिक संतुलन बदल सकता है. इसके अलावा, एक बड़ा मुद्दा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Hormuz Strait) का भी है, जो तेल सप्लाई का अहम मार्ग है. अगर यहां किसी तरह का नियंत्रण या शुल्क (टोल) लगाया जाता है, तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है. अनुमान है कि कीमतें 120-125 डॉलर से बढ़कर 150-200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जिससे पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ने का खतरा है.


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