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सूखी सर्दी, नंगी चोटियां और जल संकट की आहट: हिमालय में बारिश-बर्फबारी गायब, खतरा कितना बड़ा?

इस सर्दी हिमालयी राज्यों में बारिश और बर्फबारी की भारी कमी ने गंभीर चिंता खड़ी कर दी है. IMD के अनुसार उत्तराखंड में दिसंबर-जनवरी में शून्य बारिश, हिमाचल में ऐतिहासिक रूप से कम वर्षा और जम्मू-कश्मीर में बेहद कम बर्फबारी दर्ज हुई. कमजोर पश्चिमी विक्षोभ, नमी की कमी और तापमान असंतुलन इसके प्रमुख कारण हैं. इसका असर जल सुरक्षा, रबी फसलों, जंगलों में आग और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने पर पड़ रहा है.

सूखी सर्दी, नंगी चोटियां और जल संकट की आहट: हिमालय में बारिश-बर्फबारी गायब, खतरा कितना बड़ा?
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( Image Source:  ANI )
प्रवीण सिंह
Edited By: प्रवीण सिंह

Updated on: 17 Jan 2026 2:45 PM IST

भारत इस सर्दी एक असामान्य और चिंताजनक मौसमीय दौर से गुजर रहा है. दिसंबर और जनवरी के महीनों में जहां आमतौर पर हिमालयी राज्यों में बारिश और बर्फबारी से पहाड़ ढक जाते हैं, वहीं इस बार हालात इसके ठीक उलट हैं. इंडियन एक्‍सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार मौसम विभाग (IMD) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड में दिसंबर और जनवरी में एक बूंद बारिश नहीं हुई, हिमाचल प्रदेश में दिसंबर 1901 के बाद यानी पिछले सवा सौ सालों में छठी सबसे कम बारिश दर्ज की गई, जबकि जम्मू-कश्मीर में जनवरी में बेहद कम बारिश और बर्फबारी हुई है.

इसका नतीजा यह है कि इस सर्दी हिमालय की चोटियां असामान्य रूप से नंगी और बिना बर्फ की नजर आ रही हैं. विशेषज्ञ इसे सिर्फ एक मौसमीय विचलन नहीं, बल्कि जल सुरक्षा, कृषि उत्पादकता, जंगलों में आग और जलवायु अनिश्चितता से जुड़ा गंभीर संकेत मान रहे हैं.

पूरे देश में सूखी सर्दी, लेकिन उत्तर-पश्चिम सबसे ज्यादा प्रभावित

IMD के अनुसार, जनवरी के पहले पखवाड़े में देश को सामान्य से चार गुना कम बारिश मिली. इस अवधि में जहां सामान्य तौर पर जितनी बारिश होनी चाहिए थी, उसका एक-चौथाई से भी कम दर्ज किया गया. सबसे गंभीर स्थिति उत्तर-पश्चिम भारत की रही, जहां इस अवधि में सिर्फ 8 प्रतिशत बारिश ही हो पाई. इसमें जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के साथ-साथ पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश भी शामिल हैं.

उत्तराखंड में बढ़ती जा रही ‘सूखी सर्दी’ की परंपरा

IMD देहरादून के निदेशक सी. एस. तोमर के मुताबिक, उत्तराखंड में पिछले एक दशक से सर्दियां लगातार सूखी होती जा रही हैं. उन्होंने बताया कि पिछले 10 वर्षों में चार बार ऐसा हुआ है जब जनवरी में बहुत कम या लगभग न के बराबर बारिश हुई. तोमर का कहना है कि यह अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक नया ट्रेंड बनता जा रहा है. खासतौर पर 2024-25 की सर्दियों में उत्तर-पश्चिम भारत में 96 प्रतिशत तक बारिश की कमी दर्ज की गई, जो बेहद चिंताजनक है.

क्यों अहम है सर्दियों की बारिश और बर्फबारी?

सामान्य तौर पर सर्दियों में उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत में पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) के कारण हल्की से मध्यम बारिश होती है. यही बारिश रबी फसलों (गेहूं, सरसों, चना) के लिए जीवनरेखा मानी जाती है. पहाड़ों में बर्फ और बारिश भूजल भंडार (Aquifers) को रिचार्ज करती है. नदियों को गर्मियों तक पानी देने में यही बर्फ पिघलकर अहम भूमिका निभाती है. लेकिन इस बार यही प्रक्रिया कमजोर पड़ती दिख रही है.

पश्चिमी विक्षोभ कमजोर क्यों पड़ गए?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस सर्दी पश्चिमी विक्षोभ तो आए, लेकिन असर नहीं दिखा पाए. दिसंबर में जहां सामान्य तौर पर 6 पश्चिमी विक्षोभ आते हैं, इस बार 8 सिस्टम गुजरे, लेकिन बारिश नहीं करा सके. सी. एस. तोमर बताते हैं कि इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे - पश्चिमी विक्षोभ में नमी की कमी, कम दबाव का क्षेत्र (ट्रफ) उथला होना, जिससे नमी ऊपर नहीं उठ पाई, सिस्टम का उत्तर की ओर ऊंचे अक्षांशों में गुजरना, जिससे कश्मीर और हिमाचल में थोड़ी नमी गिरी, लेकिन उत्तराखंड तक पहुंच ही नहीं पाई और भारत पहुंचते-पहुंचते सिस्टम की गति कमजोर पड़ जाना, जिससे उसका ठहराव कम हो गया.

नेपाल तक फैली सूखे की मार

रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत के साथ-साथ नेपाल में भी सूखी सर्दी देखने को मिल रही है. यह संकेत देता है कि यह समस्या सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में फैली जलवायु अस्थिरता का हिस्सा है.

देर से बर्फबारी और ‘स्नो पर्सिस्टेंस’ की गिरावट

एक और बड़ा मुद्दा है Snow Persistence, यानी बर्फ जमीन पर कितने समय तक टिकी रहती है. तोमर बताते हैं कि अगर दिसंबर में बर्फ गिरे, तो वह लंबे समय तक जमीन में नमी बनाए रखती है. पिघलाव धीमा होता है, जिससे खेतों और जंगलों को फायदा मिलता है. लेकिन जब बर्फ फरवरी में गिरती है, तब दिन और रात के तापमान में भारी अंतर होता है. दिन में तापमान ज्यादा और रात में ठंड हो तो इससे बर्फ जल्दी पिघल जाती है और लंबे समय तक नमी नहीं टिक पाती.

जंगलों में आग: सूखी जमीन, बड़ा खतरा

कम बर्फबारी का एक खतरनाक नतीजा है जंगलों में आग. IMD और Forest Survey of India के आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड में 1 नवंबर से अब तक 1,600 से ज्यादा फायर अलर्ट मिले जबकि हिमाचल प्रदेश में 600 और जम्मू-कश्मीर में करीब 300 आए. खासतौर पर नंदा देवी नेशनल पार्क और वैली ऑफ फ्लावर्स जैसे संवेदनशील इलाकों में आग की घटनाएं सामने आई हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि वनभूमि में नमी की कमी इसकी सबसे बड़ी वजह है.

ग्लेशियरों पर मंडराता बड़ा संकट

हिमालयी ग्लेशियर पहले ही लगातार सिकुड़ रहे हैं. अब अगर सर्दियों की बर्फबारी घटती है, तो संकट और गहरा सकता है. वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक मनीष मेहता के अनुसार, ''ग्लेशियर समय से पहले पिघल सकते हैं और प्रोग्लेशियल और सुप्राग्लेशियल झीलें बन सकती हैं. इससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा बढ़ेगा. Equilibrium Line Altitude ऊपर खिसक सकती है, यानी जहां बर्फ जमती और पिघलती है, उसका संतुलन बिगड़ जाएगा. नदियों में पानी की मात्रा धीरे-धीरे घट सकती है.''

आगे क्या? राहत की उम्मीद या अस्थायी मरहम?

IMD के मुताबिक, 18 से 20 जनवरी के बीच एक नया पश्चिमी विक्षोभ आने की संभावना है, जिससे उत्तर-पश्चिम भारत में हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है. हालांकि, मौसम विभाग ने यह भी साफ किया है कि देश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश सामान्य से कम ही रह सकती है. सिर्फ पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र और उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश सामान्य या उससे थोड़ी ज्यादा हो सकती है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह राहत अस्थायी हो सकती है, क्योंकि मूल समस्या जलवायु पैटर्न में आ रहे बदलाव हैं.

चेतावनी साफ है, हिमालय की सूखी सर्दी सिर्फ पहाड़ों की कहानी नहीं है. यह संकेत है आने वाले जल संकट का, कृषि उत्पादन में गिरावट का, जंगलों और जैव विविधता पर खतरे का और भविष्य में अचानक बाढ़ और आपदाओं का. अगर सर्दियों की बारिश और बर्फबारी इसी तरह अनिश्चित होती गई, तो इसका असर मैदानी इलाकों से लेकर महानगरों तक महसूस होगा. हिमालय चुपचाप चेतावनी दे रहा है - अब सवाल यह है कि क्या हम उसे सुन रहे हैं?

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