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Pitru Paksha 2026: क्या है कुश घास? क्यों श्राद्ध में तर्पण के दौरान पहनते हैं इस घास से बनी अंगूठी

पितृ पक्ष में तर्पण की विधि शुरू होते ही कुश घास से बनी छोटी सी अंगूठी उंगली में धारण की जाती है. धार्मिक मान्यता में इस पवित्री को शुद्धता और पितृ कर्म की सही विधि से जोड़कर देखा जाता है.

Pitru Paksha 2026: क्या है कुश घास? क्यों श्राद्ध में तर्पण के दौरान पहनते हैं इस घास से बनी अंगूठी
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( Image Source:  META AI )
हेमा पंत
Edited By:हेमा पंत3 Mins Read

Updated on: 1 Oct 2026 1:04 PM IST

पितृ पक्ष में पूर्वजों के लिए किए जाने वाले तर्पण और श्राद्ध कर्म में कई चीजों का इस्तेमाल होता है, लेकिन कुश घास की अपनी खास जगह है. देखने में यह एक साधारण सी घास लगती है, मगर धार्मिक परंपराओं में इसे बेहद पवित्र माना गया है. कुश घास की उत्पत्ति भगवान विष्णु की वराह अवतार से जुड़ी है. इसी वजह से पूजा-पाठ और पितृ कर्म में इसका इस्तेमाल लंबे समय से होता आ रहा है.

तर्पण करते समय दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में कुश से बनी अंगूठी पहनने की परंपरा है, जिसे पवित्री कहा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इसे पहनकर किया गया तर्पण पवित्र माना जाता है और यह पूजा की विधि में शुद्धता बनाए रखने का प्रतीक है.

कुश घास का क्या है महत्व?

कुश घास को लेकर एक दिलचस्प धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है. कहा जाता है कि इसके हर हिस्से का संबंध त्रिदेवों से है. मान्यता के अनुसार कुश की जड़ में ब्रह्मा जी, बीच के भाग में भगवान विष्णु और सबसे ऊपर के सिरे पर भगवान शिव का वास माना जाता है. इसी वजह से इसे सामान्य घास की तरह नहीं देखा जाता, बल्कि पूजा-पाठ और पितरों से जुड़े कर्मकांड में इसे विशेष सम्मान दिया जाता है.

भगवान विष्णु से क्या है संबंध?

कुश घास की कहानी भी भगवान विष्णु के एक अवतार से जुड़ी बताई जाती है. मान्यता के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण किया, तब उनके शरीर के रोम से कुश की उत्पत्ति हुई. इसी कथा के कारण इस घास को साधारण नहीं, बल्कि पवित्र माना गया. धीरे-धीरे धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा और पितृ कर्म में इसका इस्तेमाल एक खास परंपरा का हिस्सा बन गया.

अमृत से भी जुड़ा है कुश का संबंध

कुश घास से जुड़ी एक और पौराणिक कहानी काफी दिलचस्प है. मान्यता है कि जब गरुड़ देव अमृत का कलश लेकर स्वर्ग से आए, तो रास्ते में उन्होंने कुछ समय के लिए उस कलश को कुश घास पर रख दिया था. कहा जाता है कि अमृत के स्पर्श से कुश भी पवित्र हो गई. यही वजह है कि धार्मिक अनुष्ठानों में इसे विशेष महत्व मिलने लगा और पितृ कर्म से लेकर पूजा-पाठ तक में इसका इस्तेमाल किया जाने लगा.

तर्पण में क्यों पहनते हैं पवित्री?

तर्पण की विधि शुरू होती है तो कुश से बनी छोटी सी अंगूठी भी खास तौर पर तैयार की जाती है. इसे पवित्री कहा जाता है और धार्मिक परंपरा में इसे दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में पहनने की बात कही गई है. मान्यता है कि इसे धारण करने से श्राद्ध कर्म की शुद्धता बनी रहती है और व्यक्ति पूजा के दौरान अपना ध्यान एक जगह लगा पाता है. यही वजह है कि पितरों के लिए किए जाने वाले तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान में कुश का इस्तेमाल लंबे समय से होता आया है. देखने में साधारण नजर आने वाली इस घास से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं ने इसे पितृ कर्म की विधि में एक खास स्थान दिलाया है.

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