आजाद भारत के इतिहास में अब तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता, जब किसी न्यायाधीश को संसदीय प्रक्रिया यानी महाभियोग के जरिए पद से हटाया गया हो. ऐसे में जब राजधानी दिल्ली स्थित सरकारी आवास से भारी मात्रा में संदिग्ध संपत्ति मिलने के आरोपों में घिरे जस्टिस यशवंत वर्मा चर्चा में आए, तो सवाल उठना लाज़मी था कि आखिर उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया क्यों आगे नहीं बढ़ी. जानकारों का मानना है कि यदि उनके खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई होती और वे दोषी साबित होते, तो रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले कई सरकारी लाभ जैसे पेंशन और अन्य सुविधाएं समाप्त हो सकती थीं. यही कारण माना जा रहा है कि उन्होंने पद से इस्तीफा देने से दूरी बनाए रखी और अपने कार्यकाल के पूरा होने का इंतजार किया. इस खास बातचीत में पूर्व न्यायाधीश एस.एन. ढींगरा ने कई राज खोले हैं.