जिन भगवानों की करते हैं पूजा, कैसे बनती है उनकी मूर्ति, कैसे कोई बनता है मूर्तिकार, Exclusive रिपोर्ट से जानें
नवरात्रि, दुर्गा पूजा, गणेश चतुर्थी और सरस्वती पूजा जैसे त्योहारों पर बाजारों में भगवान की खूबसूरत मूर्तियां सज जाती हैं. लेकिन इन प्रतिमाओं के पीछे मूर्तिकारों की कई दिनों की मेहनत और हुनर छिपा होता है. नोएडा के सेक्टर-20 के पास ‘स्टेट मिरर’ ने मूर्तिकारों से बात कर जाना कि मूर्तियां कैसे बनती हैं, कितनी मेहनत लगती है और इससे कितनी कमाई होती है.
नवरात्रि, गणेश चतुर्थी और सरस्वती पूजा जैसे त्योहारों पर आपने भगवान की मूर्तियां जरूर खरीदी होंगी. त्योहारों के दौरान बाजारों में अलग-अलग आकार और रंगों की सुंदर प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन मूर्तियों को बनाने में कितनी मेहनत लगती है? इन्हें बनाने की प्रक्रिया क्या होती है और मूर्तिकारों की कमाई कितनी होती है? इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए 'स्टेट मिरर' की टीम ने मूर्तिकारों से खास बातचीत की और उनके काम को करीब से समझा.
नोएडा के सेक्टर-20 के पास लंबे समय से मूर्तिकार रहते हैं. यहां सड़क किनारे अलग-अलग त्योहारों और मौसम के हिसाब से मूर्तियां बनाई और बेची जाती हैं. फिलहाल दशहरा और दुर्गा पूजा का त्योहार नजदीक है. ऐसे में यहां मां दुर्गा की प्रतिमाओं के साथ-साथ भगवान गणेश और मां सरस्वती की मूर्तियां भी तैयार की जा रही हैं.
यहां काम करने वाले ज्यादातर मूर्तिकार मूल रूप से पश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं. वे सालों से इस काम से जुड़े हैं और मूर्तियां बनाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं.
मूर्तियां बनाने का काम करने वाले विश्वजीत ने बताया कि वह बचपन से ही इस काम को सीख रहे हैं. लंबे समय तक काम सीखने के बाद अब वह खुद मूर्तियां बनाते हैं. उन्होंने बताया कि वह मूल रूप से पश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं और फिलहाल नोएडा में मूर्ति बनाने का काम करते हैं. जिस जगह वह काम करते हैं, उसके मालिक कोई और हैं.
विश्वजीत के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा बड़े स्तर पर मनाई जाती है. अब नोएडा में भी दुर्गा पूजा का आयोजन बढ़ रहा है, जिसके चलते लोग मां दुर्गा की प्रतिमाएं खरीदने के लिए आते हैं.
कई चरणों में पूरी होती है प्रक्रिया
विश्वजीत ने बताया कि मूर्ति बनाने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है. सबसे पहले बांस की मदद से प्रतिमा का ढांचा तैयार किया जाता है. इसके बाद उसमें घास या पुआल बांधकर शरीर का आकार बनाया जाता है. फिर मिट्टी और पुआल की मदद से ढांचे को तैयार किया जाता है और उस पर मिट्टी की परत चढ़ाकर प्रतिमा को आकार दिया जाता है.
मूर्ति का आकार तैयार होने के बाद उसे सुखाया जाता है. इसके बाद सतह को चिकना करने और फिनिशिंग का काम होता है. आखिर में प्रतिमा पर पेंट किया जाता है और आंखों समेत अन्य बारीक चीजें बनाई जाती हैं. विश्वजीत ने बताया कि मूर्ति की आंखें बनाने का काम सबसे कठिन होता है, क्योंकि इसमें काफी बारीकी और सावधानी की जरूरत पड़ती है.
विश्वजीत ने बताया कि मूर्ति बनाने के काम से इतनी कमाई हो जाती है कि परिवार का खर्च चल सके. गणेश चतुर्थी, सरस्वती पूजा, नवरात्रि और दुर्गा पूजा जैसे त्योहारों के दौरान काम काफी बढ़ जाता है. इन दिनों मूर्तियों की मांग ज्यादा रहती है और ग्राहक खरीदारी के लिए आते हैं.
हालांकि, त्योहारों का सीजन खत्म होने के बाद काम कम हो जाता है। ऐसे में कई मूर्तिकार अपने गांव पश्चिम बंगाल लौट जाते हैं, जहां साल के दूसरे समय में भी काम मिलता रहता है। विश्वजीत ने बताया कि वह अपने पूरे परिवार के साथ नोएडा में रहते हैं और मूर्तियां बनाकर ही परिवार का भरण-पोषण करते हैं।
बच्चे भी सीख रहे हैं काम
मूर्तिकारों के साथ कुछ बच्चे भी काम सीख रहे हैं. बातचीत के दौरान एक बच्चे ने बताया कि वह कुछ दिन पहले ही इस काम को सीखने आया है. फिलहाल वह मिट्टी और अन्य जरूरी सामान लाने जैसे शुरुआती काम करता है.
वहीं, दूसरे बच्चे ने बताया कि वह भी पश्चिम बंगाल का रहने वाला है और पिछले तीन साल से मूर्ति बनाने का काम सीख रहा है. अब उसे मिट्टी के इस्तेमाल, मूर्ति को आकार देने और उसकी फिनिशिंग के बारे में काफी जानकारी हो गई है. वह धीरे-धीरे मूर्ति बनाने के अलग-अलग चरण सीख रहा है.
बच्चे ने बताया कि उसके पिता दिव्यांग हैं और काम नहीं कर पाते. ऐसे में परिवार की मदद करने के लिए वह कम उम्र से ही यह काम सीख रहा है. मूर्तिकारों के साथ काम करते हुए वह इस पारंपरिक कला में धीरे-धीरे दक्षता हासिल कर रहा है.
प्रतिदिन करीब कितनी दिहाड़ी मिलती है?
मूर्ति बनाने की प्रक्रिया में सबसे शुरुआती काम बांस काटकर बेस तैयार करना होता है. इसके लिए भी अलग से मजदूर काम करते हैं. यहां बांस की कटाई और बेस बनाने का काम कर रहे मजदूरों ने बताया कि उन्हें प्रतिदिन करीब 800 रुपये की दिहाड़ी मिलती है.
उन्होंने बताया कि त्योहारों के दौरान मूर्तियां बनाने का काम बढ़ने पर उन्हें रोजगार मिल जाता है. वहीं, जब काम कम होता है, तो वे दूसरे स्थानों पर जाकर मजदूरी या मिस्त्री से जुड़े काम करते हैं.
त्योहारों के दौरान घरों और पंडालों में सजने वाली भगवान की प्रतिमाओं के पीछे मूर्तिकारों की कई दिनों की मेहनत होती है. बांस का ढांचा तैयार करने से लेकर मिट्टी चढ़ाने, आकार देने और रंग भरने तक हर चरण में मेहनत और हुनर की जरूरत होती है.
मूर्तिकारों के लिए त्योहार केवल आस्था का अवसर नहीं, बल्कि रोजगार और कमाई का भी अहम समय होता है. वहीं, नई पीढ़ी के बच्चे भी इस कला को सीखकर अपने परिवार की आर्थिक मदद करने की कोशिश कर रहे हैं.