दिल्ली-NCR में क्यों कमजोर हो रहे हैं फेफड़े, 40 की उम्र में भी सामने आ रहा लंग कैंसर, डॉक्टर ने क्या-क्या बताया, EXCLUSIVE
दिल्ली-NCR की जहरीली हवा का असर अब फेफड़ों की सेहत पर भी दिखाई दे रहा है. लंग्स एक्सपर्ट डॉक्टर के मुताबिक, कम उम्र में भी सांस से जुड़ी गंभीर बीमारियों और लंग कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं.
दिल्ली-NCR में बढ़ते वायु प्रदूषण के बीच फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के मामले लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं. लंग एक्सपर्ट डॉक्टर राहुल मित्तल ने State Mirror से बातचीत में बताया कि प्रदूषण और अन्य कारणों की वजह से लोगों के फेफड़े कमजोर हो रहे हैं. ऐसे में मामूली संक्रमण होने पर भी कई मरीजों को सांस फूलने की समस्या होने लगती है और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत पड़ रही है.
डॉक्टर राहुल मित्तल ने बताया कि हाल ही में H1N1 जैसे संक्रमण के दौरान भी दिल्ली-NCR में बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे और कई मरीजों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. उनके मुताबिक, प्रदूषण के कारण पहले से कमजोर फेफड़ों पर संक्रमण का असर अधिक गंभीर हो सकता है.
कहां हुआ नेशनल कॉन्फ्रेंस TESCON?
लंग्स से जुड़ी बीमारियों और उनके आधुनिक इलाज को लेकर नोएडा में 10वां नेशनल कॉन्फ्रेंस TESCON आयोजित किया जा रहा है. डॉक्टर राहुल मित्तल के मुताबिक, इस कॉन्फ्रेंस में देशभर से करीब 600 लंग्स स्पेशलिस्ट शामिल होंगे. इसमें फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों, एडवांस्ड लंग्स ट्रीटमेंट और बीमारी से बचाव के तरीकों पर चर्चा होगी. उन्होंने कहा कि कॉन्फ्रेंस का एक उद्देश्य आम लोगों के बीच भी जागरूकता बढ़ाना है, ताकि प्रदूषण से जुड़ी समस्याओं को कम करने और फेफड़ों की बीमारियों से निपटने के लिए अलग-अलग स्तर पर प्रभावी कदम उठाए जा सकें.
प्रदूषण से कैसे हो रहा लंग कैंसर?
डॉक्टर राहुल मित्तल ने बताया कि प्रदूषण में मौजूद कई तरह के टॉक्सिन सांस के जरिए शरीर में पहुंचते हैं. लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से इनका असर सांस की नली और फेफड़ों पर पड़ सकता है. उन्होंने बताया कि ब्रोंकोस्कोपी के दौरान कुछ मरीजों की सांस की नली में प्रदूषण से जुड़े सूट जैसे जमाव के संकेत भी दिखाई देते हैं. डॉक्टर के मुताबिक, प्रदूषण और अन्य जोखिम कारकों के बीच लंग कैंसर के मामले भी चिंता का विषय बने हुए हैं. अब करीब 40 वर्ष की उम्र के मरीजों में भी लंग कैंसर के मामले देखने को मिल रहे हैं, जबकि पहले यह बीमारी आमतौर पर अधिक उम्र में सामने आती थी.
क्या है ब्रोंकाइटिस?
डॉक्टर राहुल मित्तल ने बताया कि प्रदूषण के कारण सबसे ज्यादा सामने आने वाली समस्याओं में ब्रोंकाइटिस भी शामिल है. इसमें सांस की नली में सूजन हो सकती है और मरीजों को लंबे समय तक खांसी की शिकायत रहती है. कई मरीजों में खांसी दो से तीन महीने तक बनी रहती है. उन्होंने कहा कि प्रदूषण का असर केवल ब्रोंकाइटिस तक सीमित नहीं है, बल्कि एलर्जी से लेकर फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों तक कई तरह की समस्याएं बढ़ सकती हैं.
क्या न करें?
डॉक्टर राहुल मित्तल ने कहा कि प्रदूषण से निपटने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं हो सकती. आम लोगों को भी अपनी तरफ से प्रदूषण कम करने में योगदान देना होगा. उन्होंने लोगों से अपील की कि घर से ही प्रदूषण कम करने की कोशिश करें. उन्होंने कहा कि सिगरेट और किसी भी तरह के धूम्रपान से बचना चाहिए. निजी वाहनों का इस्तेमाल कम से कम करें और जहां संभव हो, सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करें. उन्होंने खेतों में पराली जलाने से लेकर वाहनों और घरों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन तक, प्रदूषण के अलग-अलग स्रोतों को कम करने के लिए सामूहिक और एकीकृत प्रयास की जरूरत बताई. डॉक्टर ने कहा कि प्रदूषण का सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ रहा है और फेफड़ों की बीमारियों के इलाज पर होने वाला आर्थिक बोझ भी लोगों को ही उठाना पड़ता है. इसलिए प्रदूषण कम करने के लिए आम जनता के साथ-साथ सरकार को भी प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है.