पितृपक्ष पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का समय माना गया है. इस दौरान पितरों के निमित्त जल अर्पित करना, श्राद्ध, पिंडदान और दान-पुण्य करने की परंपरा है. धार्मिक मान्यता में जल को पितरों की तृप्ति का प्रमुख माध्यम माना गया है. इसी भाव से पितृपक्ष में कुछ पवित्र वृक्षों के नीचे जल अर्पित करने की परंपरा भी बताई जाती है.

पीपल के नीचे जल चढ़ाएं

धार्मिक मान्यता के अनुसार पीपल में देवताओं के साथ पितरों का भी वास माना गया है. इसलिए सुबह स्नान के बाद पीपल की जड़ में जल अर्पित कर पितरों का स्मरण करना शुभ माना जाता है. जल चढ़ाते समय अपने पितरों का नाम लेकर उनकी शांति और तृप्ति की प्रार्थना की जा सकती है.

बरगद के नीचे करें पितृ स्मरण

बरगद यानी वट वृक्ष भी सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र माना गया है. धार्मिक मान्यता है कि बरगद के नीचे जल अर्पित कर पितरों का स्मरण करने और श्रद्धापूर्वक परिक्रमा करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है.

बेल वृक्ष पर जल अर्पित करें

बेल वृक्ष भगवान शिव को प्रिय माना जाता है. शिव उपासना में बेलपत्र का विशेष महत्व है. पितृपक्ष में बेल वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करते हुए भगवान शिव से पितरों की शांति की प्रार्थना करने की धार्मिक परंपरा बताई जाती है.

तुलसी के पास जल देना शुभ

तुलसी को भगवान विष्णु से संबंधित और अत्यंत पवित्र पौधा माना गया है. धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की पूजा और तुलसी की आराधना से पितरों को भी संतुष्टि प्राप्त होती है. पितृपक्ष में तुलसी के पौधे में श्रद्धापूर्वक जल अर्पित कर पूर्वजों का स्मरण किया जा सकता है. तुलसी को पितृकर्म से जोड़ने वाली परंपराएं भी प्रचलित हैं.

शमी वृक्ष के नीचे भी करें प्रार्थना

शमी वृक्ष को सनातन धर्म में पवित्र वृक्ष माना गया है. पितृपक्ष में शमी के वृक्ष के नीचे जल अर्पित कर पितरों की शांति के लिए प्रार्थना करने की परंपरा भी कुछ क्षेत्रों में बताई जाती है. शमी को पितृपक्ष में लगाए जाने वाले पवित्र पौधों में भी शामिल किया गया है.

जल अर्पित करते समय रखें श्रद्धा

पितृपक्ष में इन वृक्षों को जल देते समय सबसे महत्वपूर्ण श्रद्धा और स्मरण का भाव माना जाता है. जल अर्पित करते हुए मन ही मन अपने पितरों को याद करें और उनकी आत्मशांति की प्रार्थना करें. शास्त्रीय तर्पण में जल के साथ तिल और कुश का भी विशेष महत्व बताया गया है और विधिवत पितृ तर्पण दक्षिण दिशा की ओर मुख करके किया जाता है.