Hanuman Jayanti 2026: कलयुग के देवता बजरंगबली का नाम ' हनुमान' कैसे पड़ा? जानिए पौराणिक कथा

हनुमान जी को कलयुग का सबसे प्रभावशाली देवता माना जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उनका नाम ‘हनुमान’ कैसे पड़ा? मान्यता के अनुसार, यह नाम उनके जीवन की एक विशेष घटना से जुड़ा है, जिसमें उनकी वीरता, शरारत और दिव्य शक्तियों का अनोखा मेल दिखाई देता है.

बजरंगबली का हनुमान नाम कैसे पड़ा

(Image Source:  AI SORA )
By :  State Mirror Astro
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हिंदू धर्म में हनुमान जन्मोत्सव का विशेष महत्व होता है. इस दिन मंदिरों में भारी भीड़ एकत्रित होती है और विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना का खास महत्व होता है. हिंदू धर्म में भगवान हनुमान को संकटमोचन कहा जाता है और यह भगवान शिव के ग्याहरवें अवतार माने जाते हैं. हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि को भगवान हनुमान का जन्मोत्सव मनाया जाता है.

हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल चैत्र पूर्णिमा तिथि 01 अप्रैल को सुबह 07 बजकर 5 मिनट से लेकर 02 अप्रैल को सुबह 07 बजकर 42 मिनट तक रहेगी. उदया तिथि के अनुसार हनुमान जयंती 02 अप्रैल को मनाई जाएगी.

पूजा का शुभ मुहूर्त 

हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष हनुमान जयंती पर पूजा के लिए तीन अबूझ मुहूर्त होंगे. 02 अप्रैल को हनुमान जयंती को सुबह 06 बजकर 11 मिनट से लेकर सुबह 7 बजकर 45 मिनट तक पूजा का सबसे अच्छा मुहूर्त होगा. वहीं दोपहर अभिजीत मुहूर्त पर 12 बजे से लेकर 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगा. इसके अलावा शाम को 6 बजकर 39 मिनट से लेकर रात 08 बजकर 6 मिनट तक मुहूर्त रहेगा.

हनुमान जन्मोत्सव का महत्व

भगवान श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी को कलयुग के जाग्रत देवता माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि वे अपने भक्तों की सच्ची भक्ति से तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं और उनके जीवन के बड़े से बड़े संकट भी दूर कर देते हैं. हनुमान जी की पूजा करने से व्यक्ति को सुख, शांति, स्वास्थ्य और सफलता की प्राप्ति होती है. साथ ही नकारात्मक शक्तियां भी उनके भक्तों से दूर रहती हैं. यही कारण है कि उन्हें संकटमोचन भी कहा जाता है. हनुमान जी को कई नामों से जाना जाता है, जैसे बजरंगबली, अंजनीपुत्र, पवनपुत्र, रामभक्त आदि. लेकिन इनका सबसे प्रसिद्ध नाम ‘हनुमान’कैसे पड़ा, इसके पीछे एक रोचक पौराणिक कथा है.

ऐसे पड़ा बजरंगबली का नाम हनुमान

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, हनुमान जी का बचपन का नाम ‘मारुति’था. वे माता अंजनी और पवन देव के पुत्र थे. एक दिन बाल अवस्था में उन्हें बहुत तेज भूख लगी. तभी उनकी नजर आकाश में चमकते हुए लाल रंग के एक फल पर पड़ी. उन्होंने उसे फल समझकर खाने के लिए छलांग लगा दी. लेकिन वह लाल फल कोई और नहीं बल्कि सूर्यदेव थे. संयोग से उस दिन अमावस्या थी और राहु सूर्य को ग्रहण लगाने के लिए आगे बढ़ रहा था. लेकिन उससे पहले ही बालक मारुति सूर्य तक पहुंच गए और उन्हें निगल लिया.

जैसे ही सूर्यदेव अदृश्य हुए, पूरे संसार में अंधकार छा गया. सभी देवता और जीव-जंतु परेशान हो गए. तब सभी देवताओं ने मिलकर मारुति को समझाने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने. अंत में देवराज इंद्र से सहायता मांगी गई. इंद्रदेव ने जब बार-बार निवेदन करने पर भी मारुति ने सूर्य को मुक्त नहीं किया, तो उन्होंने अपने वज्र से मारुति की ठोड़ी (हनु) पर प्रहार कर दिया. इस प्रहार से सूर्यदेव मुक्त हो गए, लेकिन मारुति घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और उनकी ठोड़ी टेढ़ी हो गई.

जब पवन देव को अपने पुत्र के साथ हुई इस घटना का पता चला, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए. उन्होंने पूरी पृथ्वी पर वायु का प्रवाह रोक दिया, जिससे जीवों का जीवन संकट में पड़ गया. चारों ओर हाहाकार मच गया. तब सभी देवता पवन देव को शांत करने पहुंचे और उनसे वायु प्रवाह को पुनः शुरू करने की प्रार्थना की. देवताओं ने बालक मारुति को ठीक किया और उन्हें अनेक दिव्य शक्तियों का वरदान भी दिया. इंद्र के वज्र के प्रहार से उनकी ‘हनु’ (ठोड़ी) प्रभावित हो गई थी, इसलिए उसी के आधार पर उनका नाम ‘हनुमान’पड़ गया.

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