सारे जहां से अच्छा से लेकर मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहां हमारा तक...कौन थे मोहम्मद इकबाल जिसके लिखे गीत को बजाती है भारतीय सेना, अब क्यों विरोध?
दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति योगेश सिंह ने सेना के बैंड में 'सारे जहां से अच्छा' बजाने पर सवाल उठाए. उनका कहना था कि इकबाल ने पाकिस्तान की हिमायत की थी.
दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति योगेश सिंह ने सोमवार को कहा कि भारतीय सेना को अपने सैन्य बैंड में मोहम्मद इकबाल का मशहूर गीत 'सारे जहां से अच्छा' बजाना बंद कर देना चाहिए. उन्होंने यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ सदस्य आर. हरि की किताब 'द स्टोरी ऑफ वंदे मातरम्' के विमोचन कार्यक्रम में कही.
यह किताब मूल रूप से मलयालम में लिखी गई थी, जिसका अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है. इस कार्यक्रम का आयोजन RSS के वैचारिक संगठन प्रज्ञा प्रवाह की दिल्ली इकाई ने इंडस स्क्रॉल्स प्रेस के साथ मिलकर किया था.
प्रोग्राम में क्या बोले कुलपति?
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए योगेश सिंह ने 'वंदे मातरम्' और 'सारे जहां से अच्छा' को लेकर समाज के एक वर्ग के रवैये पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि कुछ लोग गर्व से इकबाल की रचना गाते हैं, लेकिन 'वंदे मातरम्' गाने से इनकार करते हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि बाद के सालों में इकबाल ने देश के विभाजन से जुड़े विचारों का समर्थन किया था. इसी आधार पर उन्होंने सवाल किया कि भारतीय सेना के बैंड में अब भी 'सारे जहां से अच्छा' क्यों बजाया जाता है. उन्होंने कहा कि सेना को अपने बैंड में यह गीत बजाना बंद कर देना चाहिए.
आरिफ मोहम्मद खान ने इकबाल को लेकर क्या कहा?
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल केरल और बिहार के पूर्व राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने योगेश सिंह की बात से अलग नजरिया रखा. उन्होंने कहा कि समय के साथ मोहम्मद इकबाल के विचार बदले थे, लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब वह भारत से गहरा प्रेम करते थे. आरिफ मोहम्मद खान ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी व्यक्ति के विचार समय के साथ बदल सकते हैं. उन्होंने इकबाल के राजनीतिक और बौद्धिक सफर को अलग नजरिए से देखने की बात कही.
आरिफ मोहम्मद खान ने 'वंदे मातरम्' के महत्व पर भी अपनी बात रखी. उन्होंने कहा, “वंदे मातरम् केवल एक देशभक्ति गीत नहीं है, बल्कि यह हमारी सभ्यतागत पहचान, स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय एकता की सामूहिक आकांक्षा का स्थायी प्रतीक है.”
इकबाल ने सारे जहां से अच्छा और मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहां कब लिखा?
मोहम्मद इकबाल ने 'सारे जहां से अच्छा' (तराना-ए-हिंद) वर्ष 1904 में लिखा था, वहीं, 'मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहां हमारा' (तराना-ए-मिल्ली) उन्होंने साल 1910 में लिखा था.
कौन थे मोहम्मद इकबाल?
मोहम्मद इकबाल का जन्म 9 नवंबर 1877 को सियालकोट में हुआ था, जो उस समय ब्रिटिश भारत का हिस्सा था. उनका निधन 21 अप्रैल 1938 को हुआ. वह इस्लामी दार्शनिक और कवि थे. उर्दू साहित्य में उनकी कविताओं को 20वीं सदी की प्रमुख रचनाओं में गिना जाता है. उन्हें आम तौर पर 'अल्लामा इकबाल' के नाम से जाना जाता है. वह 20वीं सदी के प्रभावशाली मुस्लिम विचारकों और धार्मिक दार्शनिकों में शामिल थे.
इकबाल का बचपन और शुरुआती पढ़ाई सियालकोट में हुई. उन्होंने वहां के स्कॉच मिशन कॉलेज और बाद में लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी में शिक्षा प्राप्त की. साल 1899 से 1903 तक उन्होंने लाहौर के ओरिएंटल कॉलेज में अरबी पढ़ाई. इसी दौरान उन्होंने कई कविताएं लिखीं. उनकी शुरुआती रचनाओं में 'परिंदे की फरियाद' और 'तराना-ए-हिंदी' शामिल हैं. 'तराना-ए-हिंदी' को 'सारे जहां से अच्छा' के नाम से भी जाना जाता है. यह देशभक्ति से जुड़ी एक प्रसिद्ध कविता थी, जिसे उन्होंने बच्चों के लिए लिखा था.
क्या विदेश में भी की पढ़ाई?
साल 1905 में इकबाल आगे की पढ़ाई के लिए यूरोप चले गए. उन्होंने इंग्लैंड और जर्मनी में शिक्षा प्राप्त की. इंग्लैंड में उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से दूसरी बीए डिग्री हासिल की और बाद में लिंकन्स इन से बैरिस्टर की योग्यता प्राप्त की. जर्मनी में उन्होंने म्यूनिख के लुडविग मैक्सिमिलियन विश्वविद्यालय से फिलोस्फी में पीएचडी की. उनका शोध फारस में दर्शन के विकास पर फोकस था. साल 1908 में भारत लौटने के बाद उन्होंने लाहौर में वकालत शुरू की, लेकिन उनका अधिकतर ध्यान राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास, दर्शन और धर्म से जुड़े विषयों पर लेखन और अध्ययन में रहा.
मुस्लिम समाज के राजनीतिक और आध्यात्मिक पुनरुत्थान पर दिया जोर
इकबाल मुस्लिम समाज, खासकर भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों के राजनीतिक और दोबारा उभारने के समर्थक थे. इस विषय पर उनके व्याख्यानों को 1930 में 'द रिकंस्ट्रक्शन ऑफ रिलिजियस थॉट इन इस्लाम' नाम से प्रकाशित किया गया.
साल 1927 में वह पंजाब विधान परिषद के सदस्य चुने गए. इसके अलावा उन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम लीग में भी कई जिम्मेदारियां निभाईं. साल 1930 में मुस्लिम लीग के वार्षिक अधिवेशन में दिए गए इलाहाबाद भाषण में उन्होंने ब्रिटिश भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए एक राजनीतिक ढांचे की कल्पना सामने रखी. इस भाषण को मुस्लिम लीग की टू नेशन सिद्धांत की दिशा में आगे बढ़ने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा जाता है.
पाकिस्तान में खास इज्जत?
साल 1938 में इकबाल के निधन के करीब नौ साल बाद, अगस्त 1947 में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान एक स्वतंत्र देश बना. पाकिस्तान में इकबाल को राष्ट्रीय कवि के रूप में सम्मान दिया जाता है. वहां उन्हें 'हकीम-उल-उम्मत', यानी उम्मत का ज्ञानी, और 'मुफक्किर-ए-पाकिस्तान', यानी पाकिस्तान का विचारक, भी कहा जाता है. पाकिस्तान में हर साल 9 नवंबर को इकबाल की जयंती मनाई जाती है. यह दिन वहां सार्वजनिक अवकाश होता है.