भारत की पहचान सिर्फ उसकी हजारों साल पुरानी सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं से नहीं है. इस देश की असली ताकत उन लोगों में भी बसती है, जिन्होंने अपनी प्रतिभा और तपस्या से भारत का नाम दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाया. ऐसे ही महान लोगों में एक नाम है उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का.

एक ऐसा कलाकार, जिसने एक साधारण से वाद्य यंत्र शहनाई को भारत की पहचान बना दिया. जिस शहनाई की धुन कभी शादी-ब्याह, मंदिरों और पारंपरिक आयोजनों तक सीमित मानी जाती थी, उसी शहनाई को बिस्मिल्लाह खान ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के बड़े मंच पर पहुंचा दिया. उनकी उंगलियां जब शहनाई पर चलती थीं तो सिर्फ सुर नहीं निकलते थे, बल्कि ऐसा लगता था जैसे गंगा की लहरें, बनारस की गलियां और भारत की आत्मा एक साथ बोल रही हों.

उनकी कहानी सिर्फ एक महान संगीतकार की कहानी नहीं है. यह उस इंसान की कहानी है, जिसने दुनिया की चमक देखी, विदेशों से बुलावे पाए, बड़े-बड़े सम्मान हासिल किए, लेकिन अपनी मिट्टी से कभी रिश्ता नहीं तोड़ा.

डुमरांव से शुरू हुआ वह सफर, जिसने दुनिया को चौंका दिया

21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में एक बच्चे का जन्म हुआ. परिवार संगीत से जुड़ा था. उनके पिता पैगंबर बख्श खान डुमरांव राजघराने के दरबार में शहनाई बजाते थे. परिवार की कई पीढ़ियां संगीत की साधना में लगी थीं.

बच्चे का नाम रखा गया कमरुद्दीन खान...

कहा जाता है कि जब उनके दादा रसूल बख्श खान ने नवजात को देखा तो उनके मुंह से 'बिस्मिल्लाह' शब्द निकला. शायद किसी को उस वक्त अंदाजा भी नहीं था कि यही बच्चा आगे चलकर दुनिया में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के नाम से जाना जाएगा. संगीत उनके लिए कोई नौकरी या पेशा नहीं था. यह उनके परिवार की सांसों में था. बचपन से ही शहनाई उनके जीवन का हिस्सा बन गई. धीरे-धीरे उनकी उंगलियां शहनाई पर सुर तलाशने लगीं और फिर शुरू हुई एक ऐसी साधना, जिसने भारतीय संगीत का इतिहास बदल दिया.

 

गंगा के किनारे बैठकर होती थी घंटों साधना

बिस्मिल्लाह खान जब बनारस पहुंचे तो गंगा उनके जीवन का हिस्सा बन गई. कहा जाता है कि वह गंगा के किनारे बैठकर घंटों शहनाई का रियाज करते थे. आसपास मंदिरों की घंटियां बजतीं, गंगा की लहरें बहतीं और उसी वातावरण में उनकी शहनाई के सुर गूंजते. उनके लिए गंगा सिर्फ एक नदी नहीं थी. वह उनकी प्रेरणा थी, उनकी साधना की साथी थी और उनकी आत्मा से जुड़ी हुई थी. यही वजह थी कि जब जीवन में आगे चलकर उनके सामने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बसने के अवसर आए, तब भी उनका मन बनारस से दूर नहीं जा सका.

बंटवारे के समय भी नहीं छोड़ी अपनी मिट्टी

1947 में जब देश का विभाजन हुआ तो लाखों लोगों के सामने अपनी जमीन, घर और भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो गए. उस दौर में बिस्मिल्लाह खान के सामने भी पाकिस्तान जाने का विकल्प था. लेकिन उन्होंने अपनी मिट्टी छोड़ने से इनकार कर दिया. उनके लिए बनारस सिर्फ रहने की जगह नहीं था. वह उनकी संगीत साधना का केंद्र था. गंगा उनकी शहनाई की प्रेरणा थी.

बंटवारे के समय पाकिस्तान जाने के सवाल पर उनसे जुड़ा एक बेहद चर्चित कथन है-"अरे तौबा-अस्तगफिरुल्लाह! हम बनारस छोड़कर कहां जाने वाले हैं? मैं गंगा छोड़कर पाकिस्तान नहीं जाऊंगा." यह सिर्फ एक कलाकार का बयान नहीं था. यह उस मिट्टी के प्रति प्रेम था, जिसने उन्हें पहचान दी थी. दुनिया उन्हें बुला सकती थी, लेकिन बिस्मिल्लाह खान के लिए बनारस और गंगा ही उनका सबसे बड़ा मंच थे.

1937 में पहली बड़ी कामयाबी

साल 1937 उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ लेकर आया. कलकत्ता में आयोजित ऑल इंडिया म्यूजिक कॉन्फ्रेंस में उन्होंने शहनाई बजाई. उनकी प्रस्तुति ने संगीत प्रेमियों का ध्यान खींच लिया. उस दौर में शहनाई को मुख्य रूप से पारंपरिक आयोजनों से जोड़कर देखा जाता था. लेकिन बिस्मिल्लाह खान ने साबित कर दिया कि शहनाई में भी वही गहराई, वही भाव और वही शास्त्रीय क्षमता है, जो किसी बड़े शास्त्रीय वाद्य में होती है. इसके बाद शहनाई की दुनिया बदलने लगी और इसके साथ बदलने लगी बिस्मिल्लाह खान की पहचान.

फिर आया 15 अगस्त 1947... जब आजाद भारत के साथ गूंजी शहनाई फिर वह दिन आया, जिसे भारत कभी नहीं भूल सकता. 15 अगस्त 1947. सदियों की गुलामी के बाद भारत आजाद हुआ था. दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा फहराया गया. देश जश्न में डूबा था. और इसी ऐतिहासिक मौके पर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की धुन भी गूंजी.

कल्पना कीजिए...एक तरफ लाल किले पर आजाद भारत का तिरंगा लहरा रहा था और दूसरी तरफ शहनाई के सुर वातावरण में फैल रहे थे. वह सिर्फ संगीत नहीं था. वह आजाद भारत की पहली सांस्कृतिक धड़कनों में से एक था. बिस्मिल्लाह खान की शहनाई उस ऐतिहासिक दिन का हिस्सा बन गई. यही वह क्षण था जब उनकी कला और देश की आजादी की कहानी हमेशा के लिए एक-दूसरे से जुड़ गई. मुस्लिम घर में जन्मे, लेकिन शहनाई में बसता था पूरा भारत बिस्मिल्लाह खान एक आस्थावान मुस्लिम थे. लेकिन उनकी कला किसी धर्म की दीवार में कैद नहीं थी.

उनकी शहनाई मंदिरों में भी बजती थी और मुस्लिम धार्मिक आयोजनों में भी. वह भगवान शिव को 'नाथ' के रूप में याद करते थे और अपनी साधना को उनके आशीर्वाद से जोड़ते थे. बनारस की गंगा, मंदिरों की घंटियां और मुस्लिम परिवार से मिली संगीत की परंपरा-इन सबने मिलकर उनके संगीत को एक ऐसी पहचान दी, जिसमें भारत की विविधता एक साथ दिखाई देती थी. इसलिए बिस्मिल्लाह खान सिर्फ एक शहनाई वादक नहीं बने.

वह गंगा-जमुनी तहजीब के जीवंत प्रतीक बन गए. उनकी शहनाई कहती थी कि भारत में सुरों की कोई जाति नहीं होती, संगीत का कोई धर्म नहीं होता और कला की कोई सीमा नहीं होती. दुनिया ने बुलाया, लेकिन दिल हमेशा बनारस में रहा. समय के साथ बिस्मिल्लाह खान की प्रसिद्धि भारत की सीमाओं से बाहर पहुंच गई.

उन्हें विदेशों में कार्यक्रम करने के लिए कई निमंत्रण मिले. लेकिन लंबे समय तक उन्होंने विदेश जाने से परहेज किया. उनका लगाव अपनी मिट्टी से इतना गहरा था कि उन्हें बनारस से दूर रहने की कल्पना तक पसंद नहीं थी. बाद में 1966 में भारत सरकार के आग्रह पर उन्होंने एडिनबर्ग इंटरनेशनल फेस्टिवल में प्रस्तुति दी. इसके बाद यूरोप और उत्तरी अमेरिका में भी उनकी शहनाई की गूंज पहुंची.

दुनिया ने उन्हें हाथों-हाथ लिया. लेकिन दुनिया जीतने के बाद भी बिस्मिल्लाह खान के लिए सबसे प्यारी जगह वही रही- बनारस. शहनाई उनकी पूजा थी, रियाज उनकी तपस्या. बिस्मिल्लाह खान अपनी कला को लेकर बेहद संजीदा थे. उनका मानना था कि संगीत सिर्फ कुछ तकनीक सीख लेने का नाम नहीं है. इसके लिए वर्षों की साधना चाहिए. इसी वजह से उन्होंने बहुत कम शिष्यों को शहनाई की शिक्षा दी. उनके प्रमुख शिष्यों में पंडित शैलेश भगवत का नाम लिया जाता है. पंडित एस. बल्लेश भजन्त्री सहित कई कलाकारों ने भी उनसे शिक्षा ली.

उनके लिए शहनाई सिर्फ एक वाद्य नहीं थी.

वह उनकी इबादत थी.

सम्मान भी ऐसे मिले कि देश का सिर गर्व से ऊंचा हो गया

बिस्मिल्लाह खान ने शहनाई को जो ऊंचाई दी, उसके लिए देश ने भी उन्हें भरपूर सम्मान दिया.

उन्हें देश के चारों प्रमुख नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया-

  1. पद्म श्री- 1961
  2. पद्म भूषण -1968
  3. पद्म विभूषण - 1980
  4. भारत रत्न - 2001

इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, अकादमी फेलोशिप, स्वाति संगीत पुरस्कार, टी. चौदैया राष्ट्रीय पुरस्कार और तानसेन पुरस्कार जैसे कई सम्मान मिले. लेकिन इन सभी सम्मानों में सबसे बड़ा सम्मान था भारत रत्न. 2001 में जब उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया गया तो यह सिर्फ बिस्मिल्लाह खान की उपलब्धि नहीं थी. यह उस शहनाई की जीत थी, जिसे उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े संगीत मंचों तक पहुंचाया था.

 

भारत रत्न पाने वाले तीसरे शास्त्रीय संगीतकार. बिस्मिल्लाह खान भारत रत्न पाने वाले तीसरे शास्त्रीय संगीतकार बने. उनसे पहले एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी और पंडित रविशंकर को यह सम्मान मिल चुका था. डुमरांव की गलियों से निकलकर भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान तक पहुंचने वाला यह सफर अपने आप में किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था. लेकिन बिस्मिल्लाह खान की कहानी फिल्मी नहीं थी. यह रियाज, संघर्ष, मिट्टी से प्रेम और कला के प्रति समर्पण की कहानी थी.

आखिरी इच्छा भी देश के शहीदों के नाम थी

उम्र बढ़ने लगी. शरीर कमजोर होने लगा. लेकिन संगीत के प्रति उनका प्रेम कम नहीं हुआ. 2006 में उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें वाराणसी के अस्पताल में भर्ती कराया गया. उनकी एक आखिरी इच्छा थी. इंडिया गेट पर शहनाई बजाना और देश के शहीदों को श्रद्धांजलि देना. लेकिन किस्मत को शायद कुछ और मंजूर था. उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी.

21 अगस्त 2006 को 90 वर्ष की उम्र में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. उनके निधन पर भारत सरकार ने राष्ट्रीय शोक घोषित किया. वाराणसी के फातेमान कब्रिस्तान में उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया गया. उनकी शहनाई को भी उनके साथ दफन किया गया. भारतीय सेना ने उन्हें 21 तोपों की सलामी दी. जिस कलाकार ने पूरी जिंदगी शहनाई को आवाज दी, आखिरी सफर में वही शहनाई उनकी खामोश साथी बन गई. लेकिन बिस्मिल्लाह खान कभी खत्म नहीं हुए.

 

एक महान कलाकार की मौत उसके शरीर के साथ हो सकती है, उसकी कला के साथ नहीं. बिस्मिल्लाह खान आज भी जिंदा हैं- अपनी शहनाई के सुरों में. उनके सम्मान में संगीत नाटक अकादमी ने 2006 में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार शुरू किया. यह पुरस्कार संगीत, थिएटर और नृत्य के क्षेत्र में युवा कलाकारों को दिया जाता है. 2018 में उनकी 102वीं जयंती पर Google ने भी विशेष डूडल बनाकर उन्हें याद किया. दुनिया के मशहूर गिटारवादक एरिक क्लैप्टन ने भी बिस्मिल्लाह खान को अपने संगीत पर प्रभाव डालने वाले कलाकारों में याद किया. उन्होंने बताया था कि उन्होंने खान की शहनाई की धुन को गिटार पर उतारने की कोशिश की.

सोचिए...बिहार के एक छोटे से शहर में जन्मा कलाकार, जिसकी शहनाई की शुरुआत गंगा के किनारे हुई, वह एक दिन दुनिया के महान संगीतकारों को प्रभावित करने लगा. शहनाई नहीं, भारत की आत्मा बजाते थे बिस्मिल्लाह खान.

बिस्मिल्लाह खान की कहानी को सिर्फ एक शहनाई वादक की सफलता की कहानी कह देना उनके साथ न्याय नहीं होगा.उन्होंने हमें सिखाया कि दुनिया कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए, अपनी मिट्टी का महत्व कभी कम नहीं होता. उन्होंने दिखाया कि धर्म अलग हो सकता है, लेकिन सुर एक हो सकते हैं. उन्होंने साबित किया कि एक साधारण सा वाद्य भी असाधारण ऊंचाई हासिल कर सकता है, अगर उसके पीछे वर्षों की तपस्या हो. उन्होंने दुनिया को बताया कि भारत की संस्कृति सिर्फ किताबों में नहीं है. वह गंगा की लहरों में है, मंदिर की घंटियों में है, अजान की आवाज में है और शहनाई के उन सुरों में है जो दिल को छूकर निकल जाते हैं.

डुमरांव से शुरू हुआ वह सफर लाल किले तक पहुंचा. लाल किले से निकली वह शहनाई दुनिया के बड़े मंचों तक पहुंची. और फिर वही शहनाई भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न की ऊंचाई तक पहुंची. आज उस्ताद बिस्मिल्लाह खान हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब भी शहनाई की कोई मीठी धुन हवा में घुलती है, तो ऐसा लगता है जैसे बनारस के घाट से कोई आवाज आ रही हो. यह सिर्फ शहनाई नहीं है... यह भारत की आवाज है. और शायद यही उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की सबसे बड़ी विरासत है. उन्होंने शहनाई नहीं बजाई, उन्होंने पूरी दुनिया के सामने भारत की आत्मा को सुर दे दिए.