महजबीन से Meena Kumari, गरीबी और मज़बूरी ने बनाया ट्रेजेडी क्वीन, कमल अमरोही के रहते गुलज़ार के नाम रही वसीयत
मीना कुमारी का जीवन संघर्ष, प्यार और दर्द से भरा रहा. जहां बचपन में जिम्मेदारियां मिलीं और बड़े होकर तन्हाई. कमल अमरोही से रिश्ता, गुलजार से जुड़ाव और ‘पाकीजा’ तक का सफर उन्हें अमर बना गया.
1932 के दशक की शुरुआत मुंबई के एक छोटे से किराए के कमरे में महजबीन बानो नाम की एक नन्ही सी लड़की अपनी आंखें मूंदकर सपने देखती थी. उसके पिता अली बक्स पारसी थिएटर के दिग्गज कलाकार और शायर थे, जो हारमोनियम बजाते हुए घर की रोटी-रोटी का जुगाड़ करते. मां इकबाल बेगम घर संभालतीं. परिवार गरीबी की चपेट में था. महजबीन को पढ़ाई का शौक था, लेकिन किस्मत ने उसे फिल्म स्टूडियो की चौखट पर धकेल दिया. मात्र चार साल की उम्र में, 1939 में, डायरेक्टर विजय भट्ट ने उसे अपनी फिल्म लेदर फेस (फरजंद-ए-वतन) में बच्ची की भूमिका दी.
पहला दिन, पहला शॉट, और महजबीन को मात्र 25 रुपये मिले. वह पैसे लेकर घर आई तो पिता की आंखें नम हो गईं. विजय भट्ट ने ही उसे 'बेबी मीना' नाम दिया. एक ही भूल, पूजा, नई रोशनी, बहन जैसी फिल्मों में वह बच्ची के रोल करती रही. स्कूल छोड़ना पड़ा, क्योंकि घर की जिम्मेदारी अब उस नन्ही कंधों पर थी. 14 साल की उम्र तक वह 12-13 फिल्में कर चुकी थी. फिर 1946 में बच्चों का खेल में पहली बार हीरोइन बनी. लेकिन असली तूफान 1952 में आया 'बैजू बावरा', 'दो बिगड़े दुनिया' गाने पर मीना कुमारी की आंखों में आंसू और आवाज़ में दर्द देखकर पूरा हिंदुस्तान पिघल गया. ट्रेजडी क्वीन का जन्म हो चुका था.
कमल अमरोही से प्यार का सिलसिला
1951 का साल मीना कुमारी की जिंदगी में एक भयानक एक्सीडेंट हुआ. कार दुर्घटना में वह महीनों अस्पताल में पड़ी रही. दर्द, अकेलापन और डिप्रेशन. उसी वक्त उनके जीवन में कमल अमरोही का नाम आया. कमल साहब पहले से शादीशुदा थे, तीन बच्चों के पिता, उम्र 34 साल. उन्होंने मीना को अनारकली फिल्म में रोल ऑफर किया था. एक्सीडेंट के बाद कमल रोज़ अस्पताल आते. चिट्ठियां लिखते, कविताएं सुनाते, हौसला बढ़ाते. मीना की आंखों में जो दर्द था, कमल की बातों में उसका इलाज था. धीरे-धीरे दोस्ती प्यार में बदल गई. 14 फरवरी 1952—वलेंटाइन डे गुप्त निकाह हो गया. मीना की बहन महलिका गवाह बनीं.
क्यों हुआ तलाक?
निकाह के बाद दोनों अपने-अपने घर चले गए. कुछ महीनों बाद खबर लीक हो गई. मीना के पिता ने तलाक की मांग की, लेकिन मीना ने मना कर दिया. वह पिता के घर छोड़कर कमल के घर चली आईं. शुरुआती दिनों में प्यार था, जुनून था. कमल अमरोही मीना को 'पहला और आखिरी प्यार' कहते थे. लेकिन जल्द ही सच्चाई सामने आई. कमल साहब बेहद सख्त और कंट्रोलिंग थे. मीना को शाम 6:30 बजे तक घर आना जरूरी था. मेकअप रूम में किसी को घुसने की इजाजत नहीं. सिर्फ कमल की कार में सफर. अफवाहें थीं कि घरेलू हिंसा भी होती थी. मीना, जो बचपन से आजादी के लिए लड़ रही थीं, अब एक और जेल में कैद हो गईं. डिप्रेशन बढ़ा डॉक्टर ने नींद के लिए ब्रांडी की छोटी-छोटी डोज सुझाई. शराब ने धीरे-धीरे उन्हें निगल लिया. 1964 में दोनों का तलाक हो गया. लेकिन प्यार खत्म नहीं हुआ, कमल ने पाकीजा फिल्म बनानी शुरू की पूरी तरह मीना के लिए। 14 साल की मेहनत, मीना की बीमारी के बावजूद.
गुलजार से दोस्ती और वो अनमोल वसीयत
इसी दौरान मीना की जिंदगी में एक और शख्स आया गुलजार साहब. बिमल रॉय के असिस्टेंट के तौर पर गुलजार बेनजीर फिल्म पर काम कर रहे थे. मीना और गुलजार की मुलाकात हुई दोनों शायर थे. मीना की शायरी (जो बाद में 'नाज़' नाम से छपी) और गुलजार की नज़्में एक-दूसरे से बात करती थीं. गुलजार मीना के दर्द को समझते थे. कमल के साथ टूटते रिश्ते में गुलजार उनका सहारा बने. वे मीना को 'तन्हा चांद' कहकर पुकारते. मीना उन्हें अपनी कविताएं सुनातीं, अपनी डायरियां दिखातीं. मीना की जिंदगी अब शराब, दर्द और फिल्मों के बीच झूल रही थी. 1972 में उनकी तबीयत बिगड़ी लीवर सिरोसिसय 31 मार्च 1972 को मात्र 39 साल की उम्र में उन्होंने दुनिया से विदा ली. लेकिन जाने से पहले उन्होंने अपनी सबसे अनमोल चीज़ अपने दोस्त गुलजार के नाम कर दी 250 पन्ने को अपनी पर्सनल डायरियां उन डायरियों में उनकी सारी शायरी, दर्द, प्यार, टूटन और जिंदगी की सच्ची कहानी लिखी थी. यह उनकी वसीयत थी. गुलजार साहब ने बाद में उन डायरियों को संभालकर रखा. मीना की शायरी आज भी गुलजार के ज़रिए जिंदा है. हालांकि अपने अंतिम समय में वह मुमताज़ को अपना बंगला दे गई थी.
पाकीजा और अमर प्रेम
'पाकीजा' रिलीज हुई मीना की आखिरी फिल्म. 'चलते चलते' गाना, 'इन आंखों की मस्ती के'... पूरी फिल्म मीना की ट्रेजडी से सजी थी. कमल अमरोही ने कहा था, 'यह फिल्म मीना के लिए है, मीना के बिना अधूरी है.' मीना की मौत के कुछ दिन पहले फिल्म रिलीज हुई. सिनेमाघरों में लोग रोए. मीना चली गईं, लेकिन उनकी कहानी 'पाकीजा' बन गई. मीना कुमारी ने कभी स्कूल नहीं पूरी की, लेकिन उन्होंने हिंदुस्तानी सिनेमा को एक नया रूप दिया दर्द की गहराई. बचपन की मजबूरी से शुरू हुई उनकी जिंदगी, कमल अमरोही के प्यार में फंसी, गुलजार की दोस्ती में सांत्वना पाई, और आखिर में अपनी डायरियों की वसीयत देकर चली गईं. आज भी जब कोई 'मोहे पिया बिसारो ना' गुनगुनाता है, तो मीना कुमारी की वो आंखें याद आ जाती हैं. जिनमें पूरी दुनिया का दर्द समाया था. ये थी मीना कुमारी की शानदार, दर्द भरी, प्यार भरी और अमर कहानी.