कौन था बंबई का Matka King रतन खत्री? जिसका किरदार निभा रहे हैं Vijay Varma; 60 के दशक की मशहूर टेलीफोन सट्टेबाजी की कहानी
विजय वर्मा की वेब सीरीज ‘मटका किंग’ का ट्रेलर रिलीज होते ही चर्चा में है, जिसमें एक आम आदमी के मटका साम्राज्य बनाने की कहानी दिखाई गई है. यह कहानी असली ‘मटका किंग’ रतन खत्री से प्रेरित है, जिसने जुए को आम आदमी तक पहुंचाया.
Matka King: विजय वर्मा स्टारर 'मटका किंग' का ट्रेलर रिलीज हो गया है. 38 सेकंड में ट्रेलर को जबरदस्त एनर्जी दे देते हैं. ट्रेलर में 1960 के दशक के बॉम्बे की रेट्रो वाइब्स, तंगदस्ती से निकलकर हिम्मत के साथ आगे बढ़ने की कहानी, और जुए को ‘मटका’ नाम देकर एक पूरा पैरेलल इकोनॉमी खड़ा करने वाला सफर बहुत ही इंटेंस लगता है. ट्रेलर में एक डायलॉग है- बृज भट्टी वो आदमी था, जिसने मौके पर खेलकर इतना पैसा कमाया कि सरकारी खजाना भी उसके सामने चिल्लर लगने लगा.'
दूसरे डायलॉग है- जिंदगी भी कितनी अजीब सिर्फ एक चीज पर चलती है- उम्मीद.' और तीसरा है- चाहे वो अमीर हो या गरीब सबको जिंदगी में छलांग लगाने का हक होना चाहिए.' विजय वर्मा 'बृज भट्टी' के रोल में है. क्रितिका कामरा, साई तम्हणकर, गुलशन ग्रोवर, सिद्धार्थ जाधव, भूपेंद्र जडावत और कई अन्य। इस सीरीज नागराज पोपटराव मंजुले ने डायरेक्ट किया है जिन्हें 'सैराट' और 'झुंड' के लिए जाना जाता है. 17 अप्रैल 2026 को Amazon Prime Video पर वर्ल्डवाइड प्रीमियर होगी.
'मटका किंग' की कहानी
ट्रेलर की शुरुआत 1960 के दशक में होती है. उस समय बॉम्बे शहर बहुत तेजी से बदल रहा था. नई-नई चीजें आ रही थीं, लोग सपने देख रहे थे और जिंदगी में कुछ बड़ा करने की होड़ लगी हुई थी. इसी दौर में हमारी मुलाकात बृज भट्टी से होती है. बृज भट्टी एक महत्वाकांक्षी युवक है, जो कपास का व्यापार करता है. वह मेहनत करता है, लेकिन जीवन में आगे बढ़ने के लिए कुछ और बड़ा करना चाहता है. वह शातिर दिमाग का है और बहुत होनहार भी. आजाद भारत में वह एक बेहतर और खुशहाल जिंदगी का सपना देखता है. बृज भट्टी का मानना है कि चाहे कोई अमीर हो या गरीब, हर इंसान को अपनी जिंदगी में एक बड़ी छलांग लगाने का हक और मौका मिलना चाहिए. उसी सोच के साथ उसके दिमाग में एक जबरदस्त आइडिया आता है. उस समय जुआ सिर्फ अमीर लोगों का शौक माना जाता था. लेकिन बृज भट्टी इसे आम आदमी तक ले जाना चाहता है. वह जुए को एक नया रूप देता है और उसे 'मटका' नाम से जाना जाता है. धीरे-धीरे यह 'मटका' आम लोगों के बीच इतना पॉपुलर हो जाता है कि लोग बैंक पर जितना भरोसा करते हैं, उससे कहीं ज्यादा भरोसा मटके पर करने लगते हैं.
कैसे मुंबई का साम्राज्य बना मटका किंग?
मटका एक छोटा सा खेल नहीं रह जाता, बल्कि यह एक पूरा साम्राज्य बन जाता है. बृज भट्टी इस साम्राज्य का किंग बन जाता है. लेकिन जहां इतनी बड़ी रकम और अकूत दौलत आती है, वहां खतरे भी बहुत बड़े होते हैं. पुलिस इस धंधे पर नजर रखे हुए है. साथ ही, जो पहले से ही जुए का कारोबार कर रहे अमीर लोग हैं, वे भी बृज भट्टी को अपना दुश्मन मानने लगते हैं. चारों तरफ से दांव-पेच और साजिशें शुरू हो जाती हैं. जो सफर एक सुंदर सपने के रूप में शुरू हुआ था, वही सपना अब बृज भट्टी की पूरी जिंदगी को तबाह करने का खतरा बन गया है. अब सवाल यह है कि क्या बृज भट्टी अपनी हिम्मत, अपनी चतुराई और अपने जुनून के बल पर इस ‘मटका किंग’ के सपने को बचा पाएगा? या फिर सब कुछ बिखर जाएगा और उसके सपने चूर-चूर हो जाएंगे?.
कौन था मटका किंग रतन खत्री?
रतन खत्री भारत के बंटवारे (Partition of India) के समय पाकिस्तान के कराची शहर से मुंबई आए थे. मुंबई पहुंचकर वे यहीं बस गए और शहर की जिंदगी में धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई. मुंबई ने उसके बाद कई बड़े दौर देखे अंडरवर्ल्ड का आतंक, आतंकी हमले और ब्लास्ट के समय भी शहर में सट्टेबाजी का धंधा लगातार जमता रहा. इसी बीच रतन खत्री ने पारंपरिक जुए को एक नई और खास स्टाइल दी, जिसे लोग 'मटका' के नाम से जानने लगे. इस खेल में एक मटके (मिट्टी के घड़े) से नंबर निकाला जाता था और उसे उस दिन का लकी नंबर घोषित कर दिया जाता था. उस समय इंटरनेट या मोबाइल फोन जैसी कोई सुविधा नहीं थी, सिर्फ टेलीफोन था. फिर भी रतन खत्री का यह लकी नंबर मिनटों में पूरे देश में फैल जाता था. यही मटके की जबरदस्त लोकप्रियता थी.
कब शुरू हुई कहानी?
कहानी असल में 1962 से शुरू होती है एक दिन मुंबई पुलिस कमिश्नर के दफ्तर में सफेद कुरता-पायजामा पहने एक अनजान सा शख्स आया. वहां मौजूद क्राइम रिपोर्टरों को उसने एक धमाकेदार खबर के लिए अपने साथ बुलाया. यह खबर थी पहली बार मटके से नंबर निकालकर जुए का लकी नंबर सार्वजनिक रूप से घोषित करने की. यह अनजान शख्स कोई और नहीं, बल्कि रतन खत्री ही थे. उन्होंने मुंबई के सट्टे को एक नई दिशा दी. यह तरीका बहुत जल्दी लोकप्रिय हो गया और मुंबई से शुरू होकर पूरे देश में जुए का कारोबार फैल गया. उस दौर में रात 9 बजे ट्रंक कॉल करना भी बहुत मुश्किल था. वजह यह थी कि सारी टेलीफोन लाइनें सट्टेबाजों से भरी रहती थीं. वे एक-दूसरे को उसी दिन के मटका लकी नंबर बता रहे होते थे.
क्या था टेलीफोन का इस सट्टे में रोल?
इंडियन एक्सप्रेस अखबार की एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, MTNL (टेलीफोन विभाग) रात 9 बजे के आसपास जानबूझकर सारे कॉल रोक दिया करता था, ताकि सट्टेबाज आराम से लकी नंबर बांट सकें. रतन खत्री ने यह खेल अकेले शुरू नहीं किया था. उनके साथ थे कच्छ के रहने वाले कल्याणजी गाला भी शामिल थे. कल्याणजी 1944 में कच्छ छोड़कर मुंबई आए थे. वे एक साधारण आदमी थे, जो वर्ली इलाके में राशन की दुकान चलाते थे और चॉल में रहते थे. सट्टेबाजी का यह खेल बहुत तेजी से फेमस हुआ क्योंकि चॉल में रहने वाले फैक्ट्री वर्कर भी सिर्फ 1 रुपए से खेल सकते थे. धीरे-धीरे यह खेल वर्ली से जवेरी बाजार पहुंच गया और यहीं इसका मुख्य केंद्र बन गया.
कल्याणजी पीछे रह गए और मशहूर हो गया रतन मटका
खत्री को लोगों, पुलिस और अपराधियों से डील करना अच्छी तरह आता था. चूंकि जुआ अवैध था, इसलिए उन्हें लोकल पुलिस को रिश्वत देनी पड़ती थी और अपराधियों को हफ्ता देना पड़ता था. धीरे-धीरे कल्याणजी इस खेल में खत्री से पीछे छूट गए और 'रतन मटका' बहुत मशहूर हो गया. इसका रोजाना का टर्नओवर 1 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गया था. टेलीफोन की वजह से जहां-जहां फोन लाइन पहुंचती थी, वहां-वहां खत्री का जुआ फैल चुका था. रतन खत्री ने खेल को और पारदर्शी बनाने के लिए एक अनोखा तरीका निकाला. वे पब्लिक जगह पर घूमते और किसी भी रैंडम दुकानदार को चुन लेते. फिर भीड़ के सामने उससे तीन कार्ड उठाने को कहते. इससे लोगों को लगता कि कोई चालाकी या धांधली नहीं हो रही है. बाद में वे फिल्ममेकरों से भी कार्ड चुनवाने लगे.
ऑटोबायोग्राफी 'खुल्लम खुल्ला' में दिवंगत एक्टर ऋषि कपूर ने रतन खत्री का जिक्र किया है.
उन्होंने लिखा कि साल 1976 में फिल्म रंगीला रतन बनाते समय खत्री कई बार उन्हें या अशोक कुमार को फोन करते और कार्ड चुनने को कहते. उसके बाद वह नंबर मिनटों में पूरे मुंबई में फैल जाता. ऋषि कपूर ने खत्री के टाइम मैनेजमेंट की भी मिसाल दी. एक बार खत्री बेंगलुरु से मुंबई फ्लाइट में थे. हवाई जहाज में फोन काम नहीं कर रहा था, इसलिए मटका नंबर घोषित करने में देर हो रही थी. तब खत्री ने पायलट की मदद ली और कंट्रोल टावर के जरिए नंबर अनाउंस करवा दिया. जुआ अवैध होने के बावजूद पुलिस ज्यादा कुछ नहीं कर पाती थी. अगर वे सख्ती करते तो आम लोग और बड़े-बड़े लोग दोनों नाराज हो जाते. किसी बड़ी समस्या या दुर्घटना का डर भी रहता था. लगातार सफलता मिलने के बाद भी रतन खत्री ने 1993 में मटके का सट्टा पूरी तरह बंद कर दिया. इसके पीछे एक मुख्य वजह यह बताई जाती है कि उसी साल वे अपने परिवार के साथ छुट्टियां मनाने लंदन जा रहे थे. एयरपोर्ट पहुंचने पर पता चला कि अवैध काम से जुड़े होने के कारण उनका नाम नो-फ्लाई लिस्ट में डाल दिया गया है. परिवार के सामने इस तरह की बेइज्जती सहन नहीं कर पाए और उन्होंने जुए का पूरा धंधा बंद करने का फैसला ले लिया.