भारतीय इतिहास में "तवायफ़" शब्द का जिक्र आते ही अक्सर लोगों के मन में एक सीमित और गलत तस्वीर उभरती है. लेकिन क्या वास्तव में तवायफ़ें सिर्फ महफिलों में नाचने-गाने वाली महिलाएं थीं? या फिर वे उस दौर की कला, संगीत, साहित्य और तहज़ीब की सबसे बड़ी संरक्षक थीं? इसी विषय पर प्रसिद्ध गायिका और संगीत शोधकर्ता डॉ. शोमा घोष ने कई ऐसे पहलुओं से पर्दा उठाया है, जिनके बारे में आमतौर पर इतिहास की किताबों में बहुत कम चर्चा होती है. इस खास बातचीत में डॉ. शोमा घोष ने मशहूर तवायफ़ और भारत की पहली रिकॉर्डिंग स्टार मानी जाने वाली गौहर जान की विरासत, शास्त्रीय संगीत पर उनके प्रभाव, उस्तादों और कलाकारों के साथ उनके संबंधों तथा आज़ादी के आंदोलन में कलाकारों की भूमिका पर विस्तार से बात की. साथ ही उन्होंने मिर्जापुर की प्रसिद्ध कजरी "कचौड़ी गली सुन कले बलमा" के पीछे छिपी प्रेम और विरह की उस कहानी को भी साझा किया, जो पीढ़ियों से लोककथाओं में जिंदा है लेकिन बहुत कम लोगों तक पहुंची है. यह इंटरव्यू सिर्फ संगीत की चर्चा नहीं है, बल्कि प्यार, बिछड़न, संस्कृति, समाज और भारतीय विरासत की उन परतों को समझने का अवसर है, जो समय के साथ धुंधली होती चली गईं. अगर आप भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोक परंपराओं और इतिहास के अनसुने किस्सों में रुचि रखते हैं, तो यह बातचीत आपको कई नई जानकारियों से रूबरू कराएगी.