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अब नहीं होगा टू-फिंगर टेस्ट, HC का फैसला; 10 Point में समझें रेप पीड़िताओं के लिए ऐसा क्यों बोला कोर्ट?

झारखंड हाईकोर्ट ने रेप पीड़िताओं के अधिकारों को मजबूत करते हुए विवादित टू-फिंगर टेस्ट पर पूरी तरह रोक लगाने का आदेश दिया है. कोर्ट ने शिक्षा, पुनर्वास, पुलिस संवेदनशीलता और त्वरित जांच को लेकर भी कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं.

अब नहीं होगा टू-फिंगर टेस्ट, HC का फैसला; 10 Point में समझें रेप पीड़िताओं के लिए ऐसा क्यों बोला कोर्ट?
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झारखंड हाईकोर्ट का हालिया फैसला सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि उन हजारों महिलाओं और परिवारों के दर्द की स्वीकारोक्ति है, जो यौन हिंसा के बाद न्याय के साथ-साथ सामाजिक सम्मान के लिए भी संघर्ष करते हैं. अदालत ने माना कि रेप पीड़िताएं अक्सर अपराध की शिकार होने के बावजूद समाज की तिरछी निगाहों, तानों और भेदभाव का सामना करती हैं. ऐसे में न्याय केवल अपराधी को सजा देने तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि पीड़ित के सम्मान और पुनर्वास को भी केंद्र में रखना होगा.

इसी सोच के साथ हाईकोर्ट ने कई अहम निर्देश जारी किए हैं. विवादित टू-फिंगर टेस्ट पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से लेकर रेप पीड़िताओं के साथ संवेदनशील व्यवहार, उनके बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास तक, अदालत ने एक ऐसा ढांचा तैयार करने की कोशिश की है जो पीड़ित-केंद्रित न्याय व्यवस्था को मजबूत बना सके. यह फैसला समाज को भी आईना दिखाता है कि पीड़िता को दोषी ठहराने की मानसिकता बदलने का समय आ चुका है.

क्या है टू-फिंगर टेस्ट?

टू-फिंगर टेस्ट एक विवादित और गैर-वैज्ञानिक मेडिकल प्रक्रिया है, जिसका इस्तेमाल पहले यौन उत्पीड़न या बलात्कार की पीड़िताओं की जांच के दौरान किया जाता था. इस परीक्षण में डॉक्टर पीड़िता के निजी अंग में दो उंगलियां डालकर यह आकलन करने की कोशिश करते थे कि वह पहले से यौन संबंध बना चुकी है या नहीं. कई मामलों में इसका इस्तेमाल यह अनुमान लगाने के लिए भी किया जाता था कि महिला के साथ जबरदस्ती हुई है या नहीं.

हालांकि, चिकित्सा विज्ञान और विशेषज्ञ संस्थाएं लंबे समय से इस टेस्ट को पूरी तरह अवैज्ञानिक मानती हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) सहित कई मेडिकल संस्थानों का कहना है कि किसी महिला की यौन सक्रियता या बलात्कार की पुष्टि इस तरीके से नहीं की जा सकती. हाइमन (कौमार्य झिल्ली) का प्रभावित होना साइकिल चलाने, खेलकूद, व्यायाम या अन्य सामान्य शारीरिक गतिविधियों के कारण भी हो सकता है. इसलिए इस परीक्षण का कोई विश्वसनीय चिकित्सीय आधार नहीं है.

10 Point में समझिए कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?

  1. झारखंड हाईकोर्ट ने सरकारी और निजी सभी अस्पतालों में टू-फिंगर टेस्ट पर पूर्ण रोक लगाने का आदेश दिया. अदालत ने कहा कि यह महिलाओं की गरिमा, निजता और शारीरिक स्वायत्तता के खिलाफ है.
  2. किसी डॉक्टर या पैरामेडिकल स्टाफ द्वारा टेस्ट किए जाने पर उसे पेशेवर कदाचार माना जाएगा. दोषी पाए जाने पर विभागीय और कानूनी कार्रवाई होगी.
  3. पुलिस अधिकारियों को रेप पीड़िताओं से पूरी संवेदनशीलता के साथ पेश आने को कहा गया. बयान दर्ज करते समय डर और दबाव मुक्त माहौल सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए.
  4. कोर्ट ने कहा कि पीड़िता का बयान यथासंभव महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाए. अधिकारी का पद सब-इंस्पेक्टर या उससे ऊपर का होना चाहिए.
  5. यौन अपराध मामलों से जुड़े पुलिसकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा. समय-समय पर संवेदनशीलता कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश दिए गए हैं.
  6. रेप से जन्मे बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा सरकार पर- ऐसे बच्चों को कक्षा 12 तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी. हर जिले में नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे.

  7. यदि ऐसे बच्चे आगे चलकर प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाते हैं तो उन्हें सरकारी छात्रवृत्ति मिलेगी. इसका उद्देश्य उनकी शिक्षा में आर्थिक बाधा न आने देना है.
  8. यदि पीड़िता या उसका परिवार सामाजिक दबाव के कारण अपना घर छोड़ना चाहता है, तो सरकार पुनर्वास में मदद करेगी. सुरक्षित स्थान पर बसाने के लिए व्यवस्था विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं.
  9. प्रारंभिक जांच 15 दिनों में पूरी करने का निर्देश. पूरी जांच अधिकतम दो महीने के भीतर समाप्त करने को कहा गया.
  10. कोर्ट ने कहा कि समाज में मौजूद ‘विक्टिम ब्लेमिंग’ की मानसिकता बदलनी चाहिए. न्याय का मतलब केवल अपराधी को सजा देना नहीं, बल्कि पीड़ित को सम्मान, सुरक्षा और बेहतर भविष्य देना भी है.
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