काशी विश्वनाथ धाम में सदैव विराजते हैं शिव-पार्वती, कैसे दर्शन और पूजन से मिलता है विशेष पुण्य
काशी विश्वनाथ धाम को भगवान शिव का अत्यंत पवित्र धाम माना जाता है, जहां शिव-पार्वती की दिव्य उपस्थिति का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि यहां दर्शन और पूजा करने से भक्तों को अपार पुण्य की प्राप्ति होती है.
सनातन धर्म में काशी को सबसे पवित्र और प्राचीन तीर्थों में से एक माना गया है. द्वादश ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ का नौवां स्थान है. मान्यता है कि यह नगरी अनादिकाल से भगवान शिव की कृपा से प्रकाशित है और यहां हर समय “हर-हर महादेव” के जयकारे गूंजते रहते हैं. देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए काशी पहुंचते हैं और मोक्ष की कामना करते हैं.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार काशी नगरी भगवान शिव के त्रिशूल पर स्थित है. यही कारण है कि प्रलय काल में भी इस नगरी का अस्तित्व समाप्त नहीं होता. स्कंद पुराण में काशी को अविनाशी नगरी बताया गया है, जो कभी नष्ट नहीं होती. कहा जाता है कि आकाश से देखने पर यह दिव्य प्रकाश पुंज ध्वज के समान दिखाई देता है.
शिव और शक्ति का अद्भुत स्वरूप
श्री काशी विश्वनाथ धाम को शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज्योतिर्लिंग के दाहिने भाग में मां पार्वती शक्ति स्वरूप में विराजमान हैं, जबकि बाईं ओर भगवान शिव विराजते हैं. इसी कारण काशी विश्वनाथ धाम को अत्यंत दिव्य और सिद्ध स्थान माना जाता है.
काशी में मृत्यु को माना गया है मोक्ष का मार्ग
धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है “काश्यां मरणान्मुक्ति”अर्थात काशी में देह त्यागने वाले प्राणी को मोक्ष की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि यहां स्वयं भगवान शिव भक्तों को तारक मंत्र प्रदान कर जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करते हैं. इसी विश्वास के चलते लाखों श्रद्धालु जीवन में एक बार बाबा विश्वनाथ के दर्शन की इच्छा रखते हैं.
दर्शन मात्र से पूरी होती हैं मनोकामनाएं
काशी विश्वनाथ मंदिर का आध्यात्मिक महत्व बेहद विशेष माना जाता है. मंदिर के गुंबद में स्थापित श्री यंत्र को अत्यंत चमत्कारी माना गया है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इसकी ओर देखकर सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना बाबा विश्वनाथ की कृपा से पूरी होती है. मंदिर का गर्भगृह भी तंत्र साधना की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है. यहां स्थित चार द्वारों को शांति द्वार, कला द्वार, प्रतिष्ठा द्वार और निवृत्त द्वार कहा जाता है. मान्यता है कि गर्भगृह की पांच परिक्रमा करने से भक्तों को नकारात्मक शक्तियों और बाधाओं से मुक्ति मिलती है.
जब शिव-पार्वती ने काशी को बनाया अपना धाम
विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. एक कथा के अनुसार विवाह के बाद जब भगवान शिव माता पार्वती के साथ कैलाश पर्वत पर रहने लगे, तब माता पार्वती वहां प्रसन्न नहीं थीं. उन्होंने भगवान शिव से किसी सुंदर और पवित्र स्थान पर रहने की इच्छा व्यक्त की. माता पार्वती की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान शिव कैलाश छोड़कर काशी नगरी में आ गए और यहां ज्योतिर्लिंग स्वरूप में सदा के लिए स्थापित हो गए. तभी से काशी भगवान शिव और माता पार्वती का स्थायी निवास स्थान मानी जाती है. मान्यता है कि पंचक्रोशी क्षेत्र यानी काशी के पांच कोस क्षेत्र को भगवान शिव और माता पार्वती ने प्रलय काल में भी कभी नहीं छोड़ा. इसी कारण काशी को “अविमुक्त क्षेत्र” कहा जाता है, अर्थात ऐसा स्थान जिसे भगवान शिव कभी त्यागते नहीं.
मिलता है राजसूय यज्ञ के समान फल
काशीखंड में वर्णन मिलता है कि काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के स्पर्श मात्र से राजसूय यज्ञ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है और दर्शन करने से ज्ञान का प्रकाश मिलता है. ऐसा कहा जाता है कि काशी की हर भूमि शिवमय है और यहां का प्रत्येक कण दिव्यता से भरा हुआ है. धार्मिक मान्यता यह भी है कि बाबा विश्वनाथ के दर्शन और मां गंगा में स्नान करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है. आदि शंकराचार्य, संत एकनाथ, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद और गोस्वामी तुलसीदास जैसे महान संतों ने भी इस धाम में आकर भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त किया था.




