देश के इस हिस्से में 97% हैं मुस्लिम, 47 सालों से लागू थी शराबबंदी, अब कैसे और किसे मिली छूट
केंद्र सरकार ने लक्षद्वीप में 1979 से लागू शराबबंदी कानून को खत्म कर दिया है. सरकार का मानना है कि इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और लक्षद्वीप मालदीव जैसे अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थलों से प्रतिस्पर्धा कर सकेगा.
लक्षद्वीप की जादुई दुनिया की तस्वीरें जब भी सोशल मीडिया पर आती हैं, लोगों का दिल वहां जाने के लिए मचल उठता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि मालदीव को टक्कर देने वाले भारत के इस खूबसूरत कोने में पिछले 47 सालों से एक चीज़ पर पूरी तरह 'नो-एंट्री' थी? हम बात कर रहे हैं शराब की. लेकिन अब अरब सागर के इस हसीन द्वीप समूह से एक ऐसी खबर आ रही है, जिसने न सिर्फ ट्रैवलर्स बल्कि बिजनेस जगत में भी खलबली मचा दी है.
केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला लेते हुए लक्षद्वीप में करीब पांच दशकों से चली आ रही शराबबंदी को खत्म कर दिया है. सरकार ने 'लक्षद्वीप निषेध विनियमन, 1979' (Lakshadweep Prohibition Regulation, 1979) को पूरी तरह निरस्त कर दिया है. इसका मतलब यह है कि अब इस खूबसूरत टूरिस्ट डेस्टिनेशन पर लाइसेंस दुकानों के जरिए शराब की कानूनी और विनियमित (regulated) बिक्री हो सकेगी. यह फैसला क्यों लिया गया, इसके पीछे की कहानी क्या है और यह कैसे इस द्वीप की किस्मत बदलने वाला है?.
क्या था 1979 का कानून?
साल 1979 में केंद्र सरकार ने लक्षद्वीप की सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति को देखते हुए वहां सख्त शराबबंदी लागू की थी. इस कानून के लागू होने के बाद से पूरा द्वीपसमूह लगभग 'ड्राई ज़ोन' बन गया था. हालांकि, ऐसा नहीं था कि वहां शराब की एक बूंद भी मौजूद नहीं थी. पर्यटकों और सरकारी अधिकारियों की सुविधा के लिए बेहद सीमित रखा गया था. कावारत्ती और बंगाराम द्वीपों पर बने सरकारी बार और चुनिंदा लक्ज़री रिसॉर्ट्स में परमिट के साथ शराब सर्व की इजाजत थी, लेकिन आम जनता या खुले बाज़ार में इसकी बिक्री पर पूरी तरह ताला लगा था.
धर्म, संस्कृति और स्थानीय विरोध
इस पाबंदी के पीछे का सबसे बड़ा कारण बेहद सीधा और सामाजिक था. लक्षद्वीप की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा करीब 97 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखता है. भारत के किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की तुलना में यह मुस्लिमों का सबसे बड़ा अनुपात है. वहीं, 2011 की जनगणना के अनुसार, यहां की कुल 64,473 आबादी में से लगभग 95% लोग अनुसूचित जनजाति (ST) कैटेगिरी में आते हैं. चूंकि इस्लाम धर्म में शराब का सेवन पूरी तरह बैन माना गया है, इसलिए तत्कालीन प्रशासन ने स्थानीय लोगों की धार्मिक भावनाओं, सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक ताने-बाने का सम्मान करते हुए यह बैन लगाया था. दशकों तक वहां की स्थानीय पार्टियों और सामाजिक संगठनों ने इस बात की वकालत की कि यह बैन द्वीप की शांति और कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है. यही वजह थी कि लक्षद्वीप, गुजरात और बिहार जैसे राज्यों की लिस्ट में शामिल था, जहां शराब बेचना और पीना एक बड़ा अपराध माना जाता था.
क्यों बदला गया 47 साल पुराना नियम?
अब सवाल उठता है कि जब सब कुछ सालों से शांति से चल रहा था, तो अचानक इस नियम को बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? इसका जवाब छिपा है 'ग्लोबल टूरिज्म' की रेस में. केंद्र सरकार पिछले कुछ सालों से लक्षद्वीप को दुनिया के नक्शे पर एक प्रीमियर टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित करना चाहती है. अधिकारियों का मानना रहा है कि जब इंटरनेशनल टूरिस्ट हॉलीडेज मनाने के लिए हिंद महासागर का रुख करते हैं, तो उनकी पहली पसंद मालदीव या मॉरीशस जैसे देश होते हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि मालदीव जैसे मुस्लिम बहुल देश ने भी अपने रिसॉर्ट्स और स्पेसिफाइड टूरिस्ट ज़ोन में शराब की अवेलेबिलिटी को कानूनी बना रखा है. ऐसे में, शराबबंदी के सख्त नियमों के कारण लक्षद्वीप ग्लोबल कॉम्पिटिशन में पिछड़ रहा था.
पीएम मोदी की वो तस्वीरें और बदल गई लक्षद्वीप की किस्मत
इस कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट जनवरी 2024 में आया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्षद्वीप का दौरा किया. उनकी स्नॉर्कलिंग करते हुए, समुद्र किनारे फुर्सत के पल बिताते हुए और स्थानीय लोगों से मिलते हुए तस्वीरें जैसे ही इंटरनेट पर आईं, देश-दुनिया में 'लक्षद्वीप' ट्रेंड करने लगा. यह सिर्फ एक सरकारी दौरा नहीं था, बल्कि दुनिया को यह बताने का प्रयास था कि हमारे पास मालदीव से भी खूबसूरत विकल्प मौजूद है.
इस 'मोदी इफेक्ट' का असर आंकड़ों में साफ दिखाई दिया:
साल 2020: लक्षद्वीप आने वाले पर्यटकों की संख्या महज 3,875 थी
साल 2024: यह आंकड़ा 47% की भारी उछाल के साथ 68,328 तक पहुंच गया
टूरिस्ट्स की इस भारी आमद ने प्रशासन को बुनियादी ढांचे और नियमों में बड़े बदलाव करने के लिए प्रेरित किया
क्या हैं नए नियम और पाबंदियां?
शराबबंदी हटने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि लक्षद्वीप में अब कोई भी, कहीं भी जाम छलका सकेगा. सरकार ने इसके लिए 'लक्षद्वीप नए उत्पाद शुल्क विनियम, 2026' लागू किया है. इसके तहत शराब के निर्माण, इंपोर्ट-एक्सपोर्ट, ट्रांसपोर्ट, खरीद और बिक्री को बेहद कड़े नियंत्रण में रखा जाएगा. प्रशासन ने यह साफ कर दिया है कि वह द्वीप पर कोई 'असीमित या अनियंत्रित बाज़ार' नहीं बनने देगा.
क्या है नियम?
द्वीप के प्रशासक के पास वीटो पावर है जो इस अधिकार सुरक्षित रहेगा कि वे जब चाहें, शराब की खरीद और कब्जे पर सीमा तय कर सकते हैं. वे चाहें तो लक्षद्वीप के किसी खास हिस्से में दोबारा शराबबंदी भी लागू कर सकते हैं. साथ ही 21 साल से कम उम्र के युवाओं को शराब बेचना पूरी तरह से गैर-कानूनी होगा. अब सरकारी निगमों और अधिकृत एजेंसियों को भी मादक पेय पदार्थों के आयात और खुदरा (retail) बिक्री के लिए लाइसेंस मिल सकेगा
जेब पर कितना भारी पड़ेगा टैक्स?
अगर कोई यह सोच रहा है कि लक्षद्वीप में शराब सस्ती मिलने वाली है, तो वे गलत हैं. प्रशासन ने स्थानीय स्तर पर इसके विरोध को शांत करने और इसके अत्यधिक उपभोग को रोकने के लिए टैक्स की दरें आसमान पर पहुंचा दी हैं. दिल्ली जैसे महानगरों में जहां शराब और बीयर पर करीब 25% वैट (VAT) लगता है, वहीं लक्षद्वीप का टैक्स स्ट्रक्चर होश उड़ाने वाला है. शराब का प्रकार नए नियम के तहत उत्पाद शुल्क (Excise Duty) पर नजर डाले तो:
भारतीय निर्मित विदेशी शराब (IMFL) 400%
विदेशी शराब (Imported Liquor) 400%
बीयर (Beer) 200%
वाइन (Wine) 80%
यानी लक्षद्वीप में अपनी पसंदीदा ड्रिंक का लुत्फ उठाने के लिए पर्यटकों को अपनी जेब काफी ढीली करनी होगी.
क्या पर्यटकों के लिए आसान हो जाएगा लक्षद्वीप का सफर?
लक्षद्वीप में कुल 36 द्वीप हैं, जिनमें से केवल 10 द्वीपों पर आबादी रहती है जैसे- अगत्ती, अमिनी, एंड्रोट, कल्पेनी, कावारत्ती और मिनिकॉय. वर्तमान नियमों के मुताबिक, भारतीय और विदेशी दोनों ही तरह के टूरिस्ट्स को यहां आने के लिए एक विशेष परमिट की जरूरत होती है. विदेशी पर्यटकों के लिए तो अभी भी केवल अगाटी, बंगाराम और कदमत द्वीप ही सीमित हैं. ऐसे में नए नियमों के आने के बाद, उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में परमिट की प्रक्रियाओं को भी थोड़ा आसान किया जा सकता है ताकि लक्ज़री क्रूज़ और इंटरनेशनल रिज़ॉर्ट्स को आकर्षित किया जा सके.




